होकर भुजंग ने दंभ ग्रस्त,राजा के पैर में काट लिया,
राजा पल भर ही तड़पा,विष ने जीवन को घेर लियाl
वो राजा कोई और नहीं,वो तेज प्रतापी परीक्षित था,
जो गर्भ में मरकर भी साथी श्रीकृष्ण कृपा से जीवित थाl
लेकिन वो सर्प था दंभ ग्रस्त,अपने विष में वो बड़ा मस्त,
राजा को उसने ज्यों काटा,राजा होने लगा सुस्तl
जब देखा पितृ को लस्त-पस्त,तब फूटा पुत्र का क्रोध वहाँ,
करके वो भीष्म को याद वहाँ,गरजा जनवेद सिंह वहाँl
उसने मख किया अपावन एक,आहुति से आते सर्प वहाँ,
वो क्रोध से जलता दावानल,करता जाता था भस्म वहाँl
अब मख ज्यों-ज्यों आगे बढ़ने लगा,सर्पों के आने लगे झुंड,
जनवेद आग-सा जलता था,वो करता जाता सबको भस्मl
जिस विष पर विषधर गरजा था,वो भी होने लगा सुस्त,
कुछ बिल में जाकर छिपते थे,कुछ भय से होने लगे सुस्तl
लगता था बिल्कुल ऐसा कि,मृग बीच आया हो कोई सिंह,
सब तितर-बितर हो गए सर्प,जैसे जनवेद बने हों यमl
वो बड़वानल-सा हो के तीव्र,मख करने लगा था और तीक्ष्ण,
हर-हर महादेव की बोल-बोल,सर्पों को स्वाहा करता था यज्ञl
न शिव भी रक्षक उनके थे,न कोई और सहारा था,
वो बेबस होकर मरते थे,जनवेद रचाया जो था यज्ञl
अव सात जाति हो चुकी स्वाहा,अंतिम आहूति की बारी थी,
शिव के जो गले में लिपटे थे,अबके उनकी थी भी बारी थीl
वो झट से दौड़ा था इंद्रलोक,जाकर सिंहासन लिपट गया,
जब मंत्र उच्चारण किया यहाँ,तो लगे कांपने तीन लोकl
सर्पों के झुंड सामने लगे जैसे हो केवल कोई पुष्प,
इस भीषण मरण को देख-देख,अम्बर भी गर्जना करता थाl
सब सहती है बसुधा लेकिन,वो आज क्रोध से डरती है,
जब केवल एक था सर्प बचा,जो जाकर इंद्र सिंहासन था छिपाl
सिंहासन सहित वो आने लगा ,जहाँ होता था मख ये भीषण,
सब देव रोकते सिंहासन,पर न चला कोई भी बस था वहाँl
सब जाकर श्रीपति पहुँच गए,करने वो लगे थे त्राहि माम,
तब धर छलिया का रूप प्रभु,वहाँ हुए प्रकट होता था यज्ञl
वो बोले-पुत्र जनवेद सुनो,जनवेद हुए थे शांत वहाँ,
वो बोले कोमल वचन सुना,जनवेद छोड़ दो इसे यहाँl
तब बोला नाग वो काला-सा,करता हूँ जीवित इन्हें अभी,
न तेरे वंश के वंशज को काटेगी मेरी पीढ़ी कभीl
गर काट लिया जो धोखे से,तो विष निष्फल होगा मेरा वहाँ,
इस तरह परीक्षित वंशज ने,किया दम्भ का चकनाचूर यहाँl
#ऋषभ तोमर(राधे)
परिचय : ऋषभ तोमर(राधे) मध्यप्रदेश के शहर अम्बाह (जिला मुरैना) में रहते हैंl इनकी आयु २० वर्ष है,और लिखने का शौक रखते हैंl