बारात बिदा की व दमयन्ती अपने नए घर यानि ससुराल में प्रविष्ट हुई,जहाँ सभी ने उत्साह से स्वागत किया।
दमयंती को दूसरे दिन ही देवरानी मिल गई,यानि दोनों शादियां एक साथ हुई थी।
समय का चक्र चलता रहा। दमयंती के आने के बाद से ही सत्यव्रत को एक के बाद एक अच्छी नौकरी मिलती गई, व सभी कार्य शुभ होने लगे। सत्यव्रत ९० कि.मी. दूर आना-जाना करने लगा।
सुबह जल्दी उठ सत्यव्रत के साथ ही अपना डिब्बा भी बना,संयुक्त परिवार का खाना बनाना व फिर अपनी नौकरी के लिए भागते हुए दमयंती यात्री रेल पकड़ती व नौकरी स्थल पहुँचती। यही दिनचर्या बन गई थी सत्यव्रत व दमयंती के जीवन की।
जैसे घर-घर की कहानी,सो वही यहाँ भी। शिकवा-शिकायत कि,दमयन्ती काम नहीं करती,पूरी रोटी नही बनाती,नौकरी पर चली जाती है। यह सब सुन पति अपनी पत्नी को हक से
डांटता, व मार भी देता,किन्तु अच्छे संस्कार लिए दमयंती उफ़ तक नहीं करती,न ही माता-पिता को कहती।
उसके इसी गुण ने पति को जीत लिया था। तकलीफों को सहती हुई कई बार तनाव में रेल में से गिरते-गिरते बची।
कुछ समय बाद खुशियां प्रभु ने दी और तीन पुत्रों की माँ दमयन्ती को बना दिया।संयुक्त परिवार में नौकरी करते हुए परिवार के हृदय में जगह बनाना बड़ा मुश्किल होता है,किन्तु दमयंती ने ऐसा कर दिया था। बच्चे धीरे-धीरे बड़े होने लगे।
एकसाथ पांच लोग जब छोटी गाड़ी (हीरो मैजेस्टिक) पर बैठ निकलते तो चिर-परिचित देखते ही रहते।
दस साल बाद दमयंती के सहयोग से स्वयं का मकान रामनगर में बन गया था।
संयुक्त परिवार हो व चिक-चिक न हो,ऐसा सम्भव नहीं। रोज की अशांति से अच्छा शान्ति का मार्ग अपनाना होता है,सो सत्यव्रत,दमयंती व बच्चों को लेकर
स्वयं के मकान में जा जिंदगी चलाने लगा। एक लोटे-गिलास से दमयंती ने नई गृहस्थी चालू की। समस्याओं से निपटते हुए बच्चों को स्कूल भेजना,छोटे को लादकर स्कूल ले जाना-वापिस लाना
दोनों का कार्य बन गया था।
दमयंती बिना रुके,बिना टूटे,बिना झुके अनवरत नौकरी करती रही। इससे उसने परिवार को सम्मानजनक स्थिति में खड़ा कर दिया था। इसी बीच दमयंती का गले का आपरेशन कर गठानें निकाली गई,फिर हार्निया और फिर बड़ा आपरेशन। सबकी जांच हुई,रिपोर्ट शून्य रही।
बड़ा बच्चा जवान हुआ,तो उसकी शादी दमयंती ने ऐसी धूमधाम से की कि,लोग देखते ही रहे। यह ख़ुशी ज्यादा दिन नहीं रही,क्योंकि तीसरा बेटा मोगी भोपाल शहर में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
काफी दिनों तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद बच्चा प्रभु की कृपा से सही लौटकर आ गया।
इधर दमयंती को भी जटिल रोग ने घेर लिया था,तो सत्यव्रत के साथ भी कई दुर्घटनाएं होती रहीं। इधर दमयंती जटिल रोग से ग्रसित होने के बावजूद दृढ़ता से मौत से लड़ती रही।
जिस ख़ुशी से बड़े बच्चे की शादी की थी,वह ख़ुशी मिटटी में मिल गई,क्योंकि
बहू ने कभी घर को अपना समझा ही नहीं। यूँ कहें कि,दोनों में प्रेम था नहीं, बस एक ऐसा बन्धन,जैसे थोपा गया हो ,प्रतीत हो रहा था। दमयंती इस चिंता और छोटे बच्चे की फिक्र में अपना इलाज भूल गई। उसे सत्यव्रत के भोलेपन की चिन्ता और वरण के विवाह की चिंता सता रही थी। इन चिंताओं से दमयंती और कमजोर होती चली गई।आयुर्वेदिक उपचार और पूजा-पाठ सब किया,किन्तु सब बेकार। दमयंती ने परिवार को अपने दर्द का अहसास नहीं होने दिया..वो सचमुच दमयंती देवी ही थी।
वो देवी ही थी,क्योंकि दमयंती की कर्तव्यपरायणता से कार्यालय के साथी भी प्रसन्न रहते था,परन्तु दमयन्ती की हालत देख अब वो उदास हो गए थे। अंततः उपचार कर रहे चिकित्सक
ने छह से आठ माह का समय दे दिया था।
कमजोर होने से दमयंती को खून की २०-२२ बोतल बॉटल।
सत्यव्रत के पास आज छोटी गाड़ी नहीं, बड़ी थी।दोनों साथ में ही जाते आते थे,लेकिन दो-तीन महीने से सत्यव्रत अकेला ही जा आ रहा था,क्योंकि दमयंती बिस्तर पकड़ चुकी थी। बच्चों ने सेवा में कोई कसर नहीं रखी थी,यह बात दमयंती भी जानती थी। महीने गुजरते गए,और फिर वह अंतिम महीना मई २०१७ भी आ ही गया। इस महीने के अंतिम दिन १२ मई का कालग्रसित समय रात्रि 11 बजे दमयंती ने चिकित्सक के यहां जाने से इशारे से मना कर दिया ।
सत्यव्रत तथा बच्चे पास ही बैठे थे,अचानक दमयंती उठी। हाथ-पैरों में तनाव,खिंचाव,आँखों का घूमना,लम्बी श्वांस का लेना,परिवार को देख लेना व निढाल हो जाना..सब कुछ खत्म..
-बन्द हुई आँखें,खेल खत्म हुआ..ये जिंदगी है जुआ..।
आग की तरह नाते-रिश्तेदारों,मित्रों में खबर फैली कि,दमयंती नहीं रही।
जिसको जैसा समय मिला,सब आ गए।
सत्यव्रत और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल था।
अंतिम सफर में भी वह ऐसी लग रही थी जैसे नई नवेली दुल्हन। बच्चे-पति बेहाल,चाहत रखने वालों की भीड़..और पतिव्रता सुहागन के अंतिम दर्शन को तत्पर लोग..।
काँपते हाथों से अश्रु लिए सत्यव्रत ने एक चुटकी सिंदूर ले दमयंती की मांग भर दी। दमयंती मानो कह उठी-सुहागन भेजने हेतु धन्यवाद।
और अंतिम सफर चालू..दमयंती को पति-बच्चे कांधा दे उठाते बोले-राम बोलो भाई राम..। अंतिम यात्रा चालू हुई तो मुक्तिधाम पर ही रूकी,जहाँ शरीर अग्नि के माध्यम से पंचत्त्व में मिलकर मुक्त हो जाता है। दमयंती के मुख में परिवार के सदस्यों द्वारा अंतिम बार पानी डाला गया,प्रणाम किया। तब तक नाते-रिश्तेदारों,गणमान्यों ने लकड़ी कण्डे जमाकर अंतिम शयन तैयार कर दिया। दमयंती को उठा,उस पर सुला दिया गया। बड़े बच्चे जितेश ने हाथ में अग्नि ले परिक्रमा कर माँ दमयंती को अग्नि के हवाले कर दिया। अग्नि भी जैसे सुहागन को पाकर खुश हो गई। चन्द समय में ही दमयंती का पार्थिव शरीर अग्नि की लपटों के बीच पंचतत्व में विलीन हो गया। पति अपनी पत्नी को और बच्चे अपनी माँ को अग्नि में मिलते देखते रहे।
दमयंती की सोच में वापिस घर कब आ गए,पता ही नहीं चला। दमयंती सारे झंझटों से मुक्त हो गई थी मुक्तिधाम पर।
घर आकर पति ने अलमारी खोली,उसमें एक पत्र मिला,लिखा था-ऐ जी,न रोना।आपको भगवान ने मुझे दिया,भगवान ने बुला लिया। तुमने और मेरे प्यारे बच्चों ने बहुत प्यार दिया। तुम्हें व बच्चों को कैसे भुला पाऊंगी! तुम्हारे आवाज देने पर दौड़ी चली आऊंगी। तुमसे कैसे नाता तोड़ूंगी,सात जन्मों तक तुमसे नाता जोड़ूंगी।
वह आगे और पढ़ता कि,आंसू चिट्ठी पर गिरे,सत्यव्रत रोते हुए बोला-तुम ही मेरा दम हो दमयंती..तुम ही मेरी ज्योति हो..
मेरे लिए,हम सबके लिए तुमको आना ही होगा। (क्रमश..)
#सुनील चौरे ‘उपमन्यु’
परिचय : कक्षा 8 वीं से ही लेखन कर रहे सुनील चौरे साहित्यिक जगत में ‘उपमन्यु’ नाम से पहचान रखते हैं। इस अनवरत यात्रा में ‘मेरी परछाईयां सच की’ काव्य संग्रह हिन्दी में अलीगढ़ से और व्यंग्य संग्रह ‘गधा जब बोल उठा’ जयपुर से,बाल कहानी संग्रह ‘राख का दारोगा’ जयपुर से तथा
बाल कविता संग्रह भी जयपुर से ही प्रकाशित हुआ है। एक कविता संग्रह हिन्दी में ही प्रकाशन की तैयारी में है।
लोकभाषा निमाड़ी में ‘बेताल का प्रश्न’ व्यंग्य संग्रह आ चुका है तो,निमाड़ी काव्य काव्य संग्रह स्थानीय स्तर पर प्रकाशित है। आप खंडवा में रहते हैं। आडियो कैसेट,विभिन्न टी.वी. चैनल पर आपके कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं। साथ ही अखिल भारतीय मंचों पर भी काव्य पाठ के अनुभवी हैं। परिचर्चा भी आयोजित कराते रहे हैं तो अभिनय में नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से साक्षरता अभियान हेतु कार्य किया है। आप वैवाहिक जीवन के बाद अपने लेखन के मुकाम की वजह अपनी पत्नी को ही मानते हैं। जीवन संगिनी को ब्रेस्ट केन्सर से खो चुके श्री चौरे को साहित्य-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वे ही अग्रणी करती थी।
Nice and Real story….