प्रिय विरोधी

annapurna
ओ मेरे प्रिय विरोधी,
चिर प्रगति-पथ अवरोधी।
तुझे नमस्कार है-
शत-सहस्त्र प्यार ही प्यार है।
क्योंकि,
तेरे विरोध की चिंगारियाँ हीं-
मेरी महत्वाकांक्षाओं के यज्ञ की-
पवित्र रश्मियाँ हैं,
आलोक में जिनके-
मेरी इच्छाएँ चढ़ती हैं-
प्रगति-पथ की सीढ़ियाँ।
कैसे कह दूँ मैं-
तुम मेरे विरोधी हो…
चिर प्रगति-पथ अवरोधी…?
तेरा यह विरोध न होता-
पल-पल कटुतर अवरोध न होता-
तो शायद,
मुझे मेरे अस्तित्व व उसकी गरिमा का-
बोध न होता …..।
तो फिर मेरा यह विषय भी-
शोध न होता।
तेरे विरोध में-
मेरी आत्मा,मेरा ज्ञान,मेरा गौरव-
जगा..।
धन्यवाद तुझे-
हो चिरंतन तेरा विरोध…
मुझे तेरा यह विरोध-
कल्याणमय,उत्थानमय-
मूक समर्थक-
चिर प्यारा लगा॥
                                                                                  #डॉ.अन्नपूर्णा श्रीवास्तव
 परिचय : डॉ.अन्नपूर्णा श्रीवास्तव लेखन में  कविता,कहानी,ग़ज़ल माता के आगमन-विसर्जन के गीत भजन  निबंध आदि लिखती हैं। आप लगभग सभी विधाओं में सृजन करती हैं। आप बिहार से हैं।

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