कविता – सच का धरातल

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शत–प्रतिशत सच है,
कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
न देखी जाती है उम्र,
स्वयं की और न सामने वाले की।
बस होनी चाहिए,
मन के एक कोने में ललक,
संग कुछ पाने की जिज्ञासा।
हाॅं….
सीखा जा सकता है,
एक छोटे बच्चे से।
सीख सकते हैं बुज़ुर्ग से,
घर पर आने वाले लोगों से।
राह चलते मुसाफ़िर से,
सफ़र करते संगी यात्री से।
सीख सकते हैं हरी-भरी सुंदर रमणीय,
प्रकृति के नियमों संग परिवर्तन से।
लेकिन……
सीखने के लिए,
बनना पड़ता है सदा ही एक शिष्य।
और मानना पड़ता है,
सामने वाले को शिक्षक।
त्याग करना पड़ता है,
अपने भीतर के अहं का।
इस तरह….
बढ़ाना पड़ती है क्षण-क्षण,
मन–मस्तिष्क संग सीखने की ललक।
क्योंकि …..
भली सीख मिलती है,
स्वयं के हुए अनुभव से।
साथ ही बड़ी-बड़ी सीख मिलती है,
औरों की अनुभवी बातों से।
और तब इस तरह….
मिलता है बहुत कुछ,
जीवन के सफ़र की सीखों से।

सीता गुप्ता,

दुर्ग, छत्तीसगढ़

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