कुसुम पलाश के

0 0
Read Time38 Second

शीत ओस द्वय हारे,
पीत पुष्प देख भारे,
ताक रहे भृंग प्यारे,
कुसुम पलाश के।

चाह रखे मधु पिएँ,
कली संग फूल जिएँ,
फाग राग चाह लिए,
कामना हुलास के।

मर्त्य जीव चाह रहे,
सुखदा समीर बहे,
प्रीति रीति कर गहे,
संगिनी तलाश के।

रस हीन गंध हीन,
मानवी पलाश दीन,
मधुकर भाव छीन,
जिए सम लाश के।

बाबू लाल शर्मा,बौहरा,विज्ञ
दौसा (राजस्थान)

matruadmin

Next Post

थोपी गई व्यवस्था सहने की मजबूरी

Sun Mar 14 , 2021
देश की व्यवस्था को पारदर्शी बनाने का दावा करने वाली सरकारों ने नागरिकों के विश्वास को ठगने का हमेशा से ही प्रयास किया है। गुलामी के लम्बे काल ने स्वाधीनता के मायने कहीं गुम कर दिये हैं। लोग स्वतंत्रता और वास्तविक स्वतंत्रता में अंतर करना भूल गये हैं। थोपी गई […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।