कविता – वीरा आना रक्षाबंधन पर

तन-मन अपना न्योछावर कर,
खड़े हो डटकर सीमा पर,
मेरे प्यारे भैया तुम्हरी,
हम लें बलैयाँ जी भर कर।।

भेज रही हूँ पाती भैया,
स्नेह प्यार से सींचकर,
हो सके तो आना भैया,
पावन रक्षाबंधन पर।।

माँ बाबुल हैं राह देखते,
तुम्हरे घर पर आने की,
भावज के हाथों भी सज गईं,
हरी चूड़ियाँ सावन की।।

न सोना न चांदी माँगू,
न रुपया बटुआ भर भरकर,
हो सके तो जल्दी आना,
भैया रक्षाबंधन पर।।

सावन के मेले हैं सज गए,
हिंडोले भी देखो डल गए,
कजरी के मेले घूमेंगे,
हम सब देखो जी भर कर।।

माँ–बाबा भी अपने मुख से,
देखो कुछ न बोलते,
एक आँख में गर्व के आंसू,
दूजे में विछोह के होते।।

प्यारी भावज भी है देखो,
कभी भी कुछ न बोलती,
किंतु उनकी सूनी आँखें,
उनके दर्द बयां करती।।

बेटी भी अपनी सखियों से,
कहती है ये गा–गाकर,
मेरे बाबा देखो डटे हैं,
देश की सरहद पर।।

दुश्मन टेढ़ी नज़र गड़ाए,
ताक रहा है सीमा पर,
जल्दी उसका खात्मा करके,
आना रक्षाबंधन पर।।

घर का आँगन सूना-सूना,
मन का है हर कोना सूना,
ख़ुशियाँ तुम बरसाने वीरा,
आना रक्षाबंधन पर।।

गर्मी, सर्दी, पानी में भी,
डटे हो तुम तो सीमा पर,
हम सब तो हैं घर में दुबके,
दो रजाई ओढ़ कर।।

मंदिर में राधे-गोविंद,
झूले पींगें भर–भर कर,
जल्दी आना मेरे वीरा,
हम भी झुलायें जी भरकर।।

अखाड़े भी देखो सज गये,
पहलवान तैयार भी,
कुश्ती, दंगल देखने आना,
अबके रक्षाबंधन पर।।

शिव को बेल की पात चढ़ाने,
और गंग की धार भी,
कान्हा जी को राखी बांधने,
आना रक्षाबंधन पर।।

गाँव की पावन माटी पर,
सावन की बूंदे बरस गईं,
सोंधी ख़ुशबू लेने आना,
पावन रक्षाबंधन पर।।

भैया तुम्हरे कौड़ी-पांसे,
सब रखे संभालकर,
मिलकर सब अठ्ठू खेलेंगे,
आना रक्षाबंधन पर।।

घर का आँगन महक उठेगा,
मन का कोना चहक उठेगा,
ख़ुशियों को बरसाने वीरा,
आना रक्षाबंधन पर।।

कच्चा रेशम चुनचुन कर,
राखी बनाई प्यार से,
अपने हाथ से बाधूँ भैया,
आना रक्षाबंधन पर।।

#साधना छिरोल्या
दमोह(म.प्र.)

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