मरने के बाद

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अगर मेरी
मरने की खबर
आ जाए
मेरी अंत्येष्टि पर मत आना।
वैसे आप आओगे नहीं
आँख बंद होने के बाद
लाज कहाँ बचती है
फिर भी अगर मन करे
तो भी मत आना
अगर आ गए तो
वो पांच रुपए भी याद आ जाएंगे
जो चाय पीने के लिए
मैंने कभी आपसे मांगे होंगे
लेकिन वह याद नहीं आएगा
जो मैंने आपके लिए किया।
जो मित्र मेरे पैसे मारकर बैठे हैं
वो तो बिल्कुल ना आयें
मेरे परिवार को उनके ‘आंसू’
बर्दाश्त नहीं होंगे।
मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि
मैं खुद इन दिनों कई
अंत्येष्टि में हो आया हूं।

अर्द्धेन्दु भूषण

इन्दौर, मध्यप्रदेश
लेखक वर्तमान में शहर इन्दौर में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार औऱ दैनिक अख़बार के एसोसिएट सम्पादक और स्तम्भकार है।

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