
अकेले ही वो मीलों चला होगा
हालात में इस कदर ढला होगा
उसके पसीने से खुशबू आती है
बेशक वो गरीबी में पला होगा
खुद को उसने फ़ौलाद बना डाला
सच कहूँ अंगारों पर चला होगा
राहत की साँस भी ले लिया होगा
शाम जब कभी सूरज ढला होगा
मचेगा शोर सिर्फ उसी के नाम का
देखना एक दिन जलजला होगा
किशोर छिपेश्वर”सागर”
भटेरा चौकी बालाघाट

