
फिज़ा में ना जानें
कैसा ये वाइरस आया है
जो अदृश्य होकर भी
अनगिनत से लोगों की
जीवनलीलाओं को
काल कवलित कर रहा है।
टूट रही हूं चूड़ियां
सिसक रही है जिंदगानी
मचा हुआ सा है
रुदन द्वारे -द्वारे
बीत रही है हर रात
काली रात के साए में ।
ना जाने कौन सी
सांस का सिलसिला
तेरा मेरा कहीं टूट सा जाए
आ मेरे दोस्त वह
जिंदगी जो शेष बची है
उसे अपनों के संग विशेष बनाएं
बाद में तो अवशेष होना ही है।
स्मिता जैन

