भारत-अमेरिका हिन्दी मैत्री सम्मेलन आयोजित

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इंडिया को भारत बनाने की ओर अग्रसर होने की आवश्यकता-देवेंद्र सिंह

इंदौर।

नए स्थापत्य के लिए संघर्ष व मेहनत आवश्यक है, जिसका शुभारंभ घर से होना चाहिए। हमें इंडिया को भारत बनाने की ओर बढ़ना है वरना वो दिन दूर नहीं जो दु:खद होगा, जब हिन्दी को भारत में स्थापित होने के लिए अमेरिका से निर्यात की आवश्यकता होगी। यह बात मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा आयोजित भारत-अमेरिका हिन्दी मैत्री सम्मेलन में हिन्दीयूएसए के संस्थापक एवं अमेरिका से जुड़े वक्ता देवेन्द्र सिंह जी ने कही।हिन्दी भाषा के अंतरराष्ट्रीय प्रचार और अमेरिका में हिन्दी की स्थिति और चुनौतियाँ सहित हिन्दी के मार्ग से भारत-अमेरिका में कैसे बढ़ेगी मैत्री जैसे गंभीर विषयों पर मातृभाषा उन्नयन संस्थान एवं अमेरिका की हिन्दी प्रचार संस्था हिन्दी यूएसए ने मिलकर वर्चुअल विमर्श रविवार को आयोजित किया, जिसमें हिन्दीयूएसए के संस्थापक देवेंद्र सिंह, आकाशवाणी दिल्ली के पूर्व उपमहानिदेशक लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ एवं हिन्दी यूएसए के स्वयंसेवक सुशील अग्रवाल बतौर वक्ता सम्मिलित हुए। तथा इस विमर्श का संचालन संस्थान के राष्ट्रीय सचिव गणतंत्र ओजस्वी ने किया।आयोजन के आरंभ में संस्थान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भावना शर्मा ने माँ सरस्वती की वंदना की, इसके बाद अतिथि परिचय के उपरांत विमर्श की औपचारिक शुरुआत हुई।
वर्चुअल विमर्श में दूरदर्शन के पूर्व उपमहानिदेशक लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने हिन्दी के भविष्य की चिंताओं पर प्रकाश डाला और कहा कि ‘हिन्दी के लोग ही हिन्दी को ताक़त दें तो परिदृश्य बदल सकता है, आज आवश्यकता हिन्दी के रोज़गारोन्मुखी होने की है।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘हम भारतीय बौद्धिक दरिद्रता की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे समय रहते सुधारने की आवश्यकता है। अन्यथा हम अपनी भाषा को खोते ही संस्कृति और समाज भी विखण्डित कर लेंगे।’
अमेरिका में हिन्दी सीखने वाले हिन्दीयूएसए के स्वयंसेवक एवं शिक्षक सुशील अग्रवाल ने वहाँ हिन्दी पढ़ाने में आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ‘भारत में हिन्दी शिक्षण आसान है क्योंकि बच्चों को कक्षा के बाहर भी हिन्दी बोलने, सुनने और समझने का माहौल मिल जाता है, जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं होता। यहाँ के बच्चों को खेल, चित्रकला इत्यादि माध्यमों से हिन्दी सीखनी पड़ती है और वातावरण उपलब्ध करवाना होता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘हिन्दी हमारी माँ है और माँ के लिए बीड़ा नहीं उठाया जाता बल्कि यह हमारा फ़र्ज़ है।’
मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’ ने भारत और अमेरिका के व्यावसायिक रिश्तों की मज़बूती पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि ‘भारत, विश्व का दूसरा बड़ा बाज़ार है, यदि हमारी सरकारें और जनता इस बात को ठान ले कि हमें व्यापार हिन्दी में ही करना है तो विश्व और जनमानस मिलकर हिन्दी को अपनाएगा।’
भारत-अमेरिका हिन्दी मैत्री सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करना और भारत और अमेरिकी व्यापार संवर्धन में हिन्दी की भूमिका के बारे में दोनों देशों की जनता को जागृत करना रहा।
हिन्दी मैत्री सम्मेलन में अमेरिका और भारत से सैंकड़ो श्रोता जुड़े, जिसका लाइव प्रसारण यूट्यूब चैनल आदि माध्यमों पर भी हुआ।सर्वोदय अहिंसा ट्रस्ट, संस्मय प्रकाशन, वृन्दाविहान इत्यादि संस्थाओं के द्वारा सहभागिता की गई।इस सम्मेलन में भारत के पश्चिम बंगाल, असम, कश्मीर, दक्षिण भारत, दिल्ली, बिहार, गुजरात, छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश के श्रोताओं एवं हिन्दीप्रेमियों के अलावा अमेरिका के न्यूयार्क, शिकागो, फोनिक्स आदि शहरों में बसे भारतीय हिन्दी प्रेमी भी जुड़े।सम्मेलन के अंत में आभार भावना शर्मा ने व्यक्त किया।

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।