कर्त्तव्यांतर

6 0
Read Time1 Minute, 14 Second

देश हमारा भी है देश उनका भी है ,
फिर कर्तव्यों में इतना भेदभाव क्यों ?
हम सुबह शाम चंदन महकाएँ
वे यहाँ वहाँ कूड़े फैलाएँ I
हम खेतों में अन्न उगाएँ
और वे जमाखोरी का रास रचाएँ I
हम कोरोना योद्धा बन संघर्ष करें,
वे यहाँ वहाँ थूकते जाएँ I
हम संस्कृति का पाठ पढ़ाएँ,
वे वाहिय़ात दृश्य दिखाएँ I
हम कैंसर का इलाज़ करें,
वे शराब के ठेके लगवाएँ I
हम विश्वविद्यालयों की नींव सजाएँ,
वे फर्जीवाड़ा चलावाएँ I
हम समय पर ” कर ” अदा करें,
और वे ऊधार ले लेकर चंपत हो जाएँ I
हद तो तब होती है जनाब़
सैनिक सरहदों पर गोलियाँ खाएँ,
और वे देश में हिंसा फैलाएँ I
कोई संशय नहीं कि मामला तो स्वविवेक का है।
अंतर कर्तव्य से ज्यादा संस्कार का है।।

रिमझिम झा

कटक, ओडिसा

परिचय- आप ओड़िसा राज्य के कटक शहर में बतौर हिन्दी शिक्षिका है।

matruadmin

Next Post

हमसब एक ही मालिक के झुनझुने हैं

Thu Oct 8 , 2020
ऐ कैसा फैसला है तुम्हारा, ऐ कैसा राह तुमने चुना हैं ! क्या तुम्हें पता नहीं ? हम सब एक ही मालिक के झुनझुने हैं। यहाँ वही अपने हैं,जिसने आपको अपना माना है! यहाँ तलाशो मत तमीश रिश्तों में यारों, हम सब तो इस दुनिया में पानी के बुलबुले हैं। […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।