राजनीति की बात करना मना हैं!

hemendra
राजनीति अब इतनी नागवार लगने लगी है कि राजनीति की बाते करने से लोग परेहज लगे है। तभी तो दुकानों में, कार्यालयों में, घरों में तख्ती लटका कर और समूहों में इत्तला देकर सजग किया जाने लगा है कि यहां राजनीति की बातें करना मना है। मना क्यों बात ही तो कर रहें उसमें हर्ज किसलिए? हां दिक्कत तो है इसलिए आनाकानी हो रही है। कारण भी जायज है ना, नीति का राज आज राज की नीति बन गई है उसमे हरेक दल डुबकी लगाना चाहता है। पर जनता तू-तू, मैं-मैं से लथपथ इस मायावी दलदल में नहीं घुसना चाहती। भूलभूलैया भरे माहोल कि राजनीति से भरोसा जो उठने लगा है? उस पर अपनी-अपनी पीठ थपथपाई बात-बात पर बाहे तानना मनाही का कारक बन गई है। तभी इससे बचे व बचाओं के बोल वचन गुंजार रहे है।

         सावधान! इसी फेर में कोई इसके पचडऩे में नहीं पडऩा चाहता क्योंकि नजरें हटी और दुर्घटना घटी की भांति राजनीति की बात कब ना हो जाए मुक्कालात कोई कहं नहीं सकता। ऐसे वाक्यां घटित होना आम हो गए है बतौर आए दिन कहीं ना कहीं राजनीति की नुक्ता-चिनी, नुरा-कुश्ति बनती जा रही है। बेहतरतीब, राजनीति के ये दिन आने लगे कि आमजन इसकी बातचीत करने पर भी कतराने लगे है। वह राजनीति जो शुचिता, समानता और राष्ट्रनीति की द्योतक थी। दौर में बदनियत, जालसाजी और कुटनीति के दुष्चक्रों का मिथक बनते जा रही है। ये रवैया राजनीति जैसी पवित्र शब्दों को बर्बाद करके छोडेंगा जो लोक और तंत्र के लिए हरगिज भी ठीक नहीं है।

       बदस्तुर राजनीति का इतना बुरा समय आ गया कि हम लोग इसके बारे में अनाप-शनाप राय जाहिर करने लगे। नहीं बिल्कुल नहीं राजनीति इतनी बुरी नहीं है कि इससे दूरी बनाया जाए, दूर रहेंगे तो दुरमभागी होगी। बेहतर अच्छी सम्मानजक अमली बातें कहकर अपनाने में नजदिकयां बढ़ेगी पहल देश और राजनीति दोनों का भला करेंगी। वो अलग है कि बुरे लोग राजनीति में आ गए हैं इतर राजनीति बुरी लगने और दिखने लगी है। बरबस राजनीति तो गाली जैसी हो गई है, लोग नेताजी बोल कर ताने मारने लगे है। मतलब साफ-साफ समझ में आने लगा है कि हालिया राजनीति छल, कपट और षड्यंत्र बनकर  रह गई है। या कहें साम, दाम, दंड़ और भेद की छलनीति जो भी नाम दे दो कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला।

       लिहाजा, कृपया राजनीति नहीं! की टोका-टाकी मुंह जबानी हो गई हैं जो थमने के बजाए बढ़ते ही जा रही है। इसे रोकना ही जन, वतन और वक्त की नजाकत है लेकिन रूखेगी कैसे इसका निदान हम सब को मिलकर निकालना होगा। वह मिलेंगा अच्छे लोगों के राजनीति में आने से, राज की नीति के तिकड़म से बचने और आत्मा नहीं अपितु मन की बात सुनने से। तब जाकर राजनीति की बातें करना मनाई नहीं वरन् सुनाई होगी। आखिर! हम जब तक बात नहीं करेंगे तब तक बात नहीं बनेगी। वो भी सकारात्मक, समयानुकूल तथा राष्ट्रहितैषी। फलीभूत सारगर्भित परिणाम निश्चित ही अवतरित होंगे।

     कवायद में अगर-मगर को दिगर कर जिगर से राजनैतिक स्वच्छता महाभियान का परचम लहराना होगा। डगर के असर में पाक-साफ अंदर और नापाक-गंदे मनोयोगी राजदारी नेता बाहर का रास्ता नापेंगे येही देश चाहता है। याद रहें, कोई माने या ना माने आखिरकार! राजनीति हमारी दिनचर्या के काफी इर्दगिर्द रहकर हमारे जीवन को प्रभावित करती है। वास्ते राजनीति के रास्ते को बंद नहीं प्रवाहित रखने में हम सब की भलाई निहित है। लिहाजा, राजनीति मे अपनी सेवादारी, भागीदारी, जिम्मेदारी और जवाबदारी तन, मन, धन, वचन के साथ निर्वहन की बारी अब हमारी है।

      अविरल, यहां यह देखना लाजमी है कि हम में से कितने जन पेहरी, मदहोशी सियासत दारों के चुंगल से राजनिति को बचाने सामने आते है। नहीं तो किंतु-परंतु दंतु ना करें बेहतर होगा फिर चलने दो जैसा चल रहा है वैसा। उस पर मौकापरस्त हुकमरानों के चाल, चरित्र और चेहरा की दुहाई देना बेईमानी के अलावे कुछ नहीं है। अलबत्ता समझदारी से नेतागिरी की दरबारी ही बात-बात की दमदारी कहलाएगी।

    #हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक

matruadmin

Next Post

क्यों देखते हो दूसरे को

Sat Mar 9 , 2019
फैशन ने लूट लिया । अब घरों का चैन सारे बने को चले। हीरो और हिरोइन ।I सकल सूरत देखते नहीं। न देखें अपनी औकात । होड़ करने को चले  । फिल्मी दुनियां से आज ।l कितने घर बर्बाद हो गए । इस चक्कर में पड़कर।  कितने अब भी और […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।