तब मैं प्रौढ़ शिक्षा की कक्षाएं लिया करती थी.अस्वस्थ होने की वजह से,एक महीने के लिए मैंने एक तीस-पैंतीस वर्षीया अशिक्षित-महिला,’श्यामा’ को खाना बनाने रखा था.एक शाम वह जल्दी ही खाना बनाने आ गई,पूछने पर बड़ा सकुचाते हुए उसने बताया कि,वह तीज-त्योहार, शादी-ब्याह के गीत स्वयं जोड़-जोडकर बनाती और गाती है तथा आज उसे मंदिर में भजन गाने जाना है.एक दिन उसने मुझे गाकर सुनाया भी…भाषा की अशुद्धता को नजरंदाज कर दें तो, उसके गीतों में अद्भुत भावाभिव्यंजना थी एवं आवाज तो सुरीली थी ही.मैने उसे प्रौढ़ शिक्षा के लिए कहा तो वह लजा गई…..का दीदी जी,इस उमर में पढ़े
जायीं, तो लोग का कहियन…अरे पढ़-लिखकर अपनी भाषा सुधार लो तो,तुम किताब भी लिख सकती हो, मैंने हंसकर कह दिया.मेरे स्वस्थ होने तक उसका महीना भी पूरा हो गया. जब मैं उसे रूपयें देने लगी तो वह शरमाते हुए कहने लगी,दीदी जी, हमें पढ़ाओगी?… दृढ़ संकल्प,तीक्ष्ण गाह्य-शक्ति तथा सबका प्रोत्साहन पाकर श्यामा की भाषा और लेखन में गजब का सुधार हो रहा था.मेरे प्रति कृतज्ञता उसके आंखों में झलकती थी.मुझे भी नारी-शिक्षा एवं प्रौढ़-शिक्षा को अमली-जामा पहनाना संतुष्टि दे रहा था.थोडे दिनों के बाद मेरा तबादला हो गया, बात आई-गई हो गई.आज पुस्तक-मेले में घूमते हुए, लोकभाषा-साहित्य के स्टाल पर लगी एक पुस्तक के आवरण पर पहचानी-सी तस्वीर को देख कदम ठिठक गए….पहले पृष्ठ पर नजर पड़ते ही आंखें ख़ुशी से भर आईं… आदरणीया दीदी जी को मेरा यह लोकगीत-संग्रह सादर समर्पित…श्यामा-देवी.
#पूनम (कतरियार),पटना