कोई भी समाज यदि पुरुष प्रधान है तो भी और महिला प्रधान है तो भी, एक दिन उसका पतन हो ही जाएगा। वही समाज आगे बढ़ेगा जो वास्तविक समानता पर आधारित होगा। तब परिवार स्वस्थ संस्थाओं का रूप लेंगे और उज्ज्वल व्यक्तियों के व्यक्ति समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए उपलब्ध होंगे।
दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ होने के समय तक भारतीय समाज का पतन हो चुका था। परिणाम स्वरूप एक हजार वर्ष तक भारतवासियों को तुर्कों, मुगलों और अंग्रेजों की दासता सहनी पड़ी, विकट संघर्ष करने पड़े और 1947 के बाद ही इस समाज ने फिर उठना शुरू किया। संघर्ष काल में महिलाओं की स्थिति और दयनीय हो गई। मध्यकालीन उत्तर भारत में पैर की जूती और स्त्री को एक समान माना जाने लगा। बुराइयों से और बुराइयाँ निकलीं। अशिक्षा, अंधविश्वास, रूढ़ियाँ, परम्पराएँ, यदि बारीकी से देखें तो महिलाओं को ही भुगतना पड़ा।
1500 साल की खामियाँ सत्तर साल में दूर नहीं हो सकती।आज भी समाज पुरुष प्रधान है। बहुत कम प्रतिशत पुत्री, महिला आदि के महत्व को समझ पाया है। यदि वैदिक युग के सम्मानित स्थान तक पहुँचाना है तो महिला दिवस तो मनाना ही होगा साथ ही बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ जैसे सैकड़ों कार्यक्रम चलाने होंगे ताकि जल्दी से जल्दी स्त्री के प्रति जो समाज का विकृत दृष्टिकोण है वह ठीक हो।
#डा० भारती वर्मा बौड़ाई