माँ

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dewangi agnihotri
अपनी ममता में माँ, क्यों ऐसे भेद भाव तू करती है
वो क्यों तेरा उजला दीपक, मुझे कालिमा कहती है।
याद नहीं कब हठ से माँ,तेरी गोदी में लेटी थीं .!
तूने कब स्नेह करबंदो में भरकर,मेरी मस्तक चूमी थी ..!!
क्यों न अपनी हृदय कुटी में, मुझको दौलत सी रखती है .!
अपनी ममता में माँ, क्यों ऐसे भेद भाव तू करती है।
मैं तेरी अच्छी बेटी हूँ, गैरो सी क्यों लगती हूँ ..!!
तू मांग के देखो मेरा जीवन, सर्वस्व समर्पित करती हूँ ..!!
बहते हैं नैनों से झर-झर मोती, हरदम ही विचलित रहती  हूँ ..!!
अपनी ममता में माँ, क्यों ऐसे भेद भाव तू करती है।
पल-पल कोशिश करती हूँ, मैं तेरे साँचे में ढल जाऊँ ..!!
तू पकड़ ले उँगली मेरी, तेरी परछाई बन जाऊँ ..!!
मैं कितनी तुझसे दूर हूँ माँ ,पर पास तुझे ही रखती हूँ …!!
अपनी ममता में माँ, क्यों ऐसे भेद भाव तू करती है।
तू स्नेह करें या घृणा करें ,सब ममता तेरी कहती हूँ …!!
मैं तेरी थी,में तेरी हूँ, यह बात सभी से कहती हूँ.!
तेरे कड़वे बोलों को माँ तेरा आशीष समझती हूँ ..!!
फिर अपनी ममता में माँ, क्यों ऐसे भेदभाव तू करती है।
वो क्यों तेरा उजला दीपक , मुझे कालिमा कहती है…2
#देवांगी अग्निहोत्री ‘प्रिया’
  कन्नौंज (उत्तर प्रदेश )

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