भईया जी सुपरहिट काश नाम की तरह काम चल जाता

edris
भईया जी सुपरहिट
काश नाम की तरह काम चल जाता
लेकिन फ़िल्म में ऐसा कुछ भी न हो पाया
यह फ़िल्म लगभग 7 साल पहले शुरू हुई थी, सन 2012 में इसका पहला पोस्टर लांच किया गया था उसके बाद से तमसम पचड़ों(लम्बी दास्तान) के चलते फ़िल्म न बन पाई न प्रदर्शित हो पाई, अब जाकर फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो हुवा भी यही जो स्टॉक क्लियरन्स सेल में होता है, दर्शको ने सिरे से नकार दिया, अब जब कि बॉलीवुड दर्शको को हिंदी, दक्षिड, हॉलीवुड के साथ विश्व सिनेमा आसानी से उपलब्ध हो तो वह बासी फ़िल्म पर क्यो जा कर अपना पैसा और समय बर्बाद करेगे ???
दर्शक आजकल बडी समझदारी से फ़िल्म का चयन करता हैं, वाजिब मनोरंजन पर ही समय और पैसा खर्च करता है,
तो यह सब कुछ हुवा
भईया जी सुपरहिट के साथ भी
वेसे भी सनी देओल रिटायरमेंट पर ही है और प्रीटी तो फिल्मो से सन्यास लगभग ले ही चुकी है तो यह जोड़ी हुई थकी और चुकी हुई जोड़ी
सनी की फिल्में उनके जॉनर यानी एक्शन में कमाई नही दे पा रही है तो कॉमेडी में तो उम्मीद ही दूर की कौड़ी होगी
बस बुराई तो थमने का नाम नही ले रही लेकिन मैं भी क्या करूँ
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खैर
फ़िल्म पर आते है
फ़िल्म बनारस के देवी दयाल दुबे उर्फ भईयाजी(सनी देओल) जो कि शहर के डॉन है, लेकिन अचानक उनकी पत्नी सपना दुबे(प्रीटी जिंटा)घर छोड़ कर चली गई है तो वह गड़बड़ा गए है, भईयाजी के चाचा(बृजेन्द्र काला) उन्हें मनोचिकित्सक डॉक्टर बुद्धिसागर(संजय मिश्रा)को दिखाते है परंतु कोई न सलाह काम आती है न दवाई,,
अचानक सपना भईयाजी को तलाक का नोटिस भेज देती हैं, जिससे भईयाजी ओर अधिक हताश ओर निराश हो जाते है, गोल्डी कपूर(अरशद वारसी) जो कि फ़िल्म निर्देशक है मुम्बई में जो निर्माताओं को ऊची नीची दे देकर पैसा एठता रहता है, भईया जी फिरौती के लिए उठा कर बनारस लाते है तो गोल्डी भईया जी को इमोशनली ग्रिप कर के एक चाल चलता है और भईया जी को एक फ़िल्म बना कर भाभी को दिखा कर वापस लाने की सलाह देता है,, की सपना फ़िल्म देख प्रभावित होकर वापस आ जाए, भईया जी इस चाल में फस जाते है,,
अब जब फ़िल्म में फ़िल्म शुरू होती है तो अंदर की फ़िल्म की हिरोइन मल्लिका(अमीषा पटेल)और लेखक तरुण पॉर्नो घोष(श्रेयस तलपड़े)की आमद होती है
इधर भईया जी का मालो असबाब (जायदाद)देख कर फ़िल्म मल्लिका के मन मे लालच आ जाता है और सपना को भईया जी की ज़िंदगी से हटाकर खुद अंदर आने की कोशिश में लग जाती है, लेकिन भईया जी का पत्नी के प्रति अगाध प्रेम के चलते वह टस से मस नही होते,,,साथ ही जब भी भईयाजी सपना को घर लाने की कोशिश करते है गोल्डी बड़ी चालाकी से उसे रूकवा देता है, क्योकि फ़िल्म पूरी करना है,
अब सपना वापस आती है या नही यह तो फ़िल्म से पता चलेगा,
 दोस्तो फ़िल्म देखने की सलाह बिल्कुल नही दूंगा
फ़िल्म की कहानी, संवाद इतने लचीले, कमज़ोर है कि फ़िल्म रेंगती प्रतीत होती है ,,,
प्रस्तुतिकरण भी इतना साधारण है कि फ़िल्म घिसीपिटी लगने लगती है,,
गाने भी खानापूर्ति करने लगे,,
दो नैना गाना थोड़ा सा प्रभावित करता है बस, शेष तो भूल ही जाए
नीरज पाठक का निर्देशन भी कही पर भी पकड़ नही बना पाया,  फ़िल्म में एक्शन , कॉमेडी , इमोशन, ग्लेमर सब कुछ भरने के चक्कर मे निर्देशन की पकड़ खो बैठे
फ़िल्म को हमारी तरफ से महज 2 स्टार्स

#इदरीस खत्री

परिचय : इदरीस खत्री इंदौर के अभिनय जगत में 1993 से सतत रंगकर्म में सक्रिय हैं इसलिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं| इनका परिचय यही है कि,इन्होंने लगभग 130 नाटक और 1000 से ज्यादा शो में काम किया है। 11 बार राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व नाट्य निर्देशक के रूप में लगभग 35 कार्यशालाएं,10 लघु फिल्म और 3 हिन्दी फीचर फिल्म भी इनके खाते में है। आपने एलएलएम सहित एमबीए भी किया है। इंदौर में ही रहकर अभिनय प्रशिक्षण देते हैं। 10 साल से नेपथ्य नाट्य समूह में मुम्बई,गोवा और इंदौर में अभिनय अकादमी में लगातार अभिनय प्रशिक्षण दे रहे श्री खत्री धारावाहिकों और फिल्म लेखन में सतत कार्यरत हैं।

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