बचपन में तू शोर शराबे से कितना घबराता था
गर थोड़ा सा मैं ना दिखूँ तो तू कितना डर जाता था ॥
दिवाली पर फुलझड़ियों की चिंगारी दिख जाए तो
तेज पटाखे के शोर से भाग के घर में आता था ॥
अब गोली बारूदो की आवाज़े कैसे तू सह जाता है
माँ के बिन अब वहाँ अकेले कैसे तू रह जाता है ॥
याद तुझे है क्या बेटा जब तू स्कूल को जाता था
देर जरा सी गर हो जाए मन मेरा डर जाता था ॥
भूल गया क्या तू जब , जब तुझको ठोकर भी लग जाती थी
दर्द भले तुझको होता था आँख मेरी भर जाती थी ॥
तुझे चोट गर लगे कभी और मुँह से आह निकल आती थी
फिर दुनियाँ चाहे कुछ बोले मैं दुनियाँ से लड़ जाती थी ॥
जब तक तेरे सर पर मेरे ममता का छाया था
कभी कोई दुख लाल मेरे ना तुझको छु भी पाया था ॥
दिन भर थक कर लाल मेरे जब तू घर को आता था
मेरी गोदी में सर रखकर चैन से तू सो जाता था ॥
मेरी ममता के साये में तूने दुनियाँ देखी है
मेरे लाल तू अमर रहे बस माँ ये दुवाएं देती है ॥
फिकर में तेरी भूख प्यास अब मुझको भी नही लगती है
जल्दी आना लाल मेरे ये बूढ़ी आँखे तेरा रस्ता तकती हैं ॥
बाकी सब कुशल यहाँ है और वहाँ तुम कुशल ही रहना
जल्दी आना राजा भईया बोल रही है तेरी बहना ॥
ये गाँव ये चौबारे सब खाली , खाली लगते हैं
तेरे सारे संगी साथी रस्ता तेरा तकते हैं ॥
तेरे बिन अब त्यौहारों में ना कोई धूम मचाता है
घर की चौखट से आँगन तक तेरी याद दिलाता है ॥
बाग़ बग़ीचे खेत खलिहान सूना सारा गाँव सीवान
तेरे बिन अब सुने सुने से लगते हैं ये खेत खलिहान ॥
अब अमराइयों में कोयल भी देशप्रेम ही गाती है
फूलों पर मंडराती तितली रक्षा का मार्ग दिखाती है॥
तू भी सबको याद है करता या फिर भूल गया है गाँव
वो गाँव की कच्ची सड़कें और पीपल की ठंडी छाँव ॥
अच्छा छोड़ो बहुत हुआ अब घर गाँव और खेत सेवार
पापा तेरे भेज रहे हैं लल्ला तुझको ढेरों प्यार ॥
आगे लिखना मुश्किल है अब कलम नही चल पायेगी
जितना तुझको सोचूँगी बेटा, यादें उतना तड़पायेगी ॥
हुआ बहुत अब कुशल क्षेम अपना हाल भी भिजवाना
बेहतर होगा पहली छुट्टी मिलते ही घर आ जाना ॥
तेरी
(माँ )
#गरिमा सिंह
परिचय-
नाम- गरिमा अनिरुद्ध सिंह
साहित्यिक उपनाम-मधुरिमा
राज्य-गुजरात
शहर-सूरत
शिक्षा- एम ए प्राचीन इतिहास
कार्यक्षेत्र-शिक्षण
विधा – हास्य ,वीर रस ,शृंगार