जहाँ है गंगा की उर्मिल धारा,
जहाँ ध्रुव कोई बन जाए तारा
जहाँ शून्य है जन्मा,
जिसे जाने जहां सारा
जिसके भाल पर शोभित पर्वतराज है न्यारा,
जहाँ है स्वयं गिरधर ने कोमल पांव पखारा
जिसके ओज से यहाँ औरंगजेब है हारा,
जहाँ पाकर ज्ञान की अमृत बना ‘कवि’ कालिदास बेचारा
जिसके ज्ञान ने यहाँ नन्द वंश संहारा,
वो देश है मेरा भारतवर्ष प्यारा।
जहाँ नचिकेता यमराज से आत्मज्ञान ले आता है,
जहाँ सावित्री के जप-तप से सत्यवान जी जाता है,
जहाँ बुद्ध की इक पुकार से अंगुलीमाल रुक जाता है,
जहाँ कनिष्ठा की निष्ठा में गोवर्धन झुक जाता है,
जहाँ शबरी के जूठे बेरों से संजीवनी उग आता है,
जहाँ देख सिल पर निशान एक वरदराज जग जाता है,
जहाँ अमित ज्ञान की अमिट स्रोत है;
जो विश्व गुरु कहलाता है,
वो भारतवर्ष है मेरा जिसपर मन मेरा मदमाता है।
जहाँ हैं जन्म लिए भगवान,जहाँ के बलशाली हनुमान
जहाँ भगवान करे स्नान,जहाँ की मर्यादा पहचान
जहाँ हैं हिय में बसते राम,जहाँ खेले कृष्ण-बलराम
जहाँ की अमन एक पैगाम,जहाँ बसतें हैं चारों धाम
जहाँ थे अभिमन्यु से वीर,जहाँ थे युधिष्ठिर से धीर
जहाँ थे अर्जुन के लक्षित तीर,जहाँ थे भीष्म से व्रती पीर
जहाँ की माटी उसकी इत्र,जहाँ थे कर्ण से अद्भुत मित्र
जहाँ बादल में बनते चित्र,जहाँ थे सुदामा से पाक चरित्र
जहाँ के पंछी गाते गीत,जहाँ शत्रु हो जाते मीत
जहाँ हारे को मिलती जीत,जहाँ सरहद न कोई भीत
जहाँ की शौर्य है उसकी शान,जहाँ स्नेह दिलाता मान
जहाँ सुख-दुःख एक समान,वो मेरा भारतवर्ष महान।
जहाँ के सारथी कृष्ण-मुरार,जहाँ दुर्गा के दस अवतार
जहाँ परशु सा दिव्य कुठार ,जहाँ प्रलय-गांडीव की टंकार
जहाँ का पुत्र श्रवण कुमार,जहाँ माँ काली पहने अरि-मुंडेरों की हार
जहाँ के मूल निवासी आर्य,जहाँ पूजा जाता हो कार्य,
जहाँ के अजेय द्रोण आचार्य,जहाँ के कुलगुरु कृपाचार्य
जहाँ शोणित वीरों का श्रृंगार,जहाँ सिंधु में उठता ज्वार
जहाँ हिमशिला रही हुंकार,जहाँ बारिश लाता मल्हार
जहाँ है वेदों का भंडार,जहाँ शास्त्रों का हो समाहार
जहाँ हो दीपों का त्योहार,जहाँ हो रंगों का बौछार
जहाँ पूजे जाते औजार,जहाँ के हरे खेत पतवार
जहाँ न भूखा न बीमार,है सबका भारत पालनहार।
परिचय-
नाम-अलोक कुमार
साहित्यिक उपनाम-अलोक कुमार वशिष्ठ
वर्तमान पता-पकरीबरावां (एरुरी)
राज्य-बिहार
शहर-नवादा
शिक्षा-जारी 12वीं कक्षा में अध्ययनरत
विधा -आलेख/कविता
लेखन का उद्देश्य-सामाजिक बदलाव