जब भी करता हूँ इक़रार
अपनी चाहत का उससे
सब जानकर भी बनते हुए अंजान
अल्हड़पन से खिलखिलाती
पूछने लगती है व्याख्या एहसासों की
बिल्कुल पगली सी है
कैसे समझाऊं उसे
एहसास व्याख्यायित करने के लिए नहीं होते
होते हैं खुशबू की तरह जो नज़र नहीं आते
रंग होते हैं जो छुए नहीं जाते
बस महसूस किए जातें हैं रूह से
आज फिर उसकी ज़िद
कि बताऊँ उसके ख़ातिर तड़प अपनी
एहसास से परे शब्दों में मुखर
उसे कैसे जताऊं
कि मेरी लत बन गई है वो
हर पल ऐसे ही तड़पता हूँ उसके लिए
जैसे डूबता हुआ कोई
तड़पता है किनारे के लिए
मरता हुआ कोई जैसे तड़पता है एक साँस के लिए
ठीक वैसे ही जैसे
कान्हा की बंसी सुनकर तड़पती थीं ब्रज की गोपियाँ सारी
जैसे लैला-मजनू, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल तड़पते थे एक दूजे के लिए
मछली तड़पती है जैसे पानी से बिछड़ कर
जैसे कोई सदियों का भूखा तड़पता है रोटी के लिए
सहरा में गुम हुआ कोई प्यासा
तड़पता है जैसे एक बूंद के लिए
जैसे कोई भटका हुआ राही तड़पता है मंज़िल के लिए
जैसे कोई ड्रग एडिक्ट तड़पता है ड्रग के लिए
कुछ इसी तरह तड़पता हूँ मैं उसके लिए …..
भरत मल्होत्रा।
परिचय :-
नाम- भरत मल्होत्रा
मुंबई(महाराष्ट्र)
शैक्षणिक योग्यता – स्नातक
वर्तमान व्यवसाय – व्यवसायी
साहित्यिक उपलब्धियां – देश व विदेश(कनाडा) के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों , व पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
सम्मान – ग्वालियर साहित्य कला परिषद् द्वारा “दीपशिखा सम्मान”, “शब्द कलश सम्मान”, “काव्य साहित्य सरताज”, “संपादक शिरोमणि”
झांसी से प्रकाशित “जय विजय” पत्रिका द्वारा ” उत्कृष्ट साहितय सेवा रचनाकार” सम्मान एव
दिल्ली के भाषा सहोदरी द्वारा सम्मानित, दिल्ली के कवि हम-तुम टीम द्वारा ” शब्द अनुराग सम्मान” व ” शब्द गंगा सम्मान” द्वारा सम्मानित
प्रकाशित पुस्तकें- सहोदरी सोपान
दीपशिखा
शब्दकलश
शब्द अनुराग
शब्द गंगा