अवसरों का लाभ लो तुम
समय को पहचान कर।
बहुमूल्य जीवन के सभी
ऋतुओं को अपना मान कर||
तुम श्रेष्ठ कृति हो ब्रह्म की
उस मनुज का अवतार तुम हो।
धरा, अंबर, सूर्य, ग्रह,
ब्रह्मांड का विस्तार तुम हो।
तुम जगत की श्रेष्ठता के
वास्तविक नायक बने हो।
तुम अखिल ब्रह्मांड के
हर तत्व के गायक बने हो।
पुनः नवनिर्माण कर
निज शक्तियों को जान कर।
अवसरों का लाभ लो तुम
समय को पहचान कर||
हैं बहुत अवरोध तो
अवरोध का खण्डन करो।
मार्ग के हर शूल को
तुम कर्म से चंदन करो।
हो नहीं भयभीत
चाहे घोर अंधकार हो।
अंतर्निहित विश्वास दीपक
से तिमिर प्रतिकार हो।
बढ़ चलो सन्मार्ग पर अब
अडिगता को ठान कर।
अवसरों का लाभ लो तुम
समय को पहचान कर||
हाथ हैं दोनों बंधे
यह समय है प्रतिकूल माना।
सन्मार्ग पर चलते हुए
कुछ हो गई हो भूल माना।
बंधनों के पाश में
जकड़े अकेले पड़ रहे हो।
शत्रु का संहार कर
बाधाओं से तुम लड़ रहे हो।
हो विजय उद्घोष फिर
गाण्डीव का संधान कर।
अवसरों का लाभ लो तुम
समय को पहचान कर||
परिचय–
नाम- आशुतोष’आनंद’दुबे
पिता- स्व आनंद दुबे
माता- श्रीमती राजेश्वरी दुबे
जिला- बिलासपुर छत्तीसगढ़
विधा- ओज, श्रृंगार, गीत, छंद, मुक्तक, सामयिक कविताएँ, आदि।
साहित्यिक संस्था- संयोजक, अरपांचल साहित्य समिति एवं राष्ट्रीय कवि संगम, उपजिला इकाई (पेण्ड्रा)।
Mon Aug 13 , 2018
जिस द्वार पर लिखा मिले सुस्वागतम् वही हमारी कुटिया है तुम चले आना । घास- पूस से सुसज्जित है दम्भ द्वेष वहाँ वर्जित है नाजुक हैं उसकी किवाड़ी ज़रा प्रेम से धकियाना । सौंधी – सौंधी महक मिलेगी कुछ चिड़ियों की चहक मिलेगी परम शांति वहाँ हवा में कुछ शहरों […]