देखो कैसे रुठ गया है ये दर्पण ?
हाथ से कैसे छूट गया है ये दर्पण |
प्रतिबिम्बों की चाह न करना अब इससे,
नीचे गिरकर टूट गया है ये दर्पण |
आंखों में बरसा सावन था दर्पण,
गंगा की लहरों-सा पावन था दर्पण |
मैं कहता हूँ तुम भी मानो ये बातें ,
हर मन का मनभावन था दर्पण |
मुझको एक चकोर बनाता था दर्पण,
अपने दिल का चोर बनाता था दर्पण |
जिन रातों को नींद मुझे न आती थी,
उन रातों को भोर बनाता था दर्पण |
#विनय शुक्ला
2 thoughts on “‘दर्पण’”
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स्वाभिमान
Thu Mar 9 , 2017
गर चली जाए मेरी जान वतन पर, तो इतना-सा काम करना.. दे देना मेरी चिता को मुखाग्नि, न मेरे मातपिता को परेशान करना। जानता हूँ रोएंगें वो बहुत, इसीलिए तुम थोडा-सा उनका ध्यान करना.. गर न मानें फिर भी वो तो, भगतसिंह-चंद्रशेखर की ख्याति का बखान करना। बता देना उन्हें […]

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बसंत


good very good bhai ji
Very nice poetry