16,14 की यति पर
तनिक नहीं संदेह भक्ति पर,
गर्व सदा कुर्बानी का|
लिखते लिखते चूक गया तू,
सच में सार कहानी का||
हे बादल उस दिन यदि तूने,
चेतक याद किया होता|
दिशा,दशा अब बदली होती,
कुछ पल साथ दिया होता||
रानी को तू प्यारा था अरु,
रानी तुझको प्यारी थी|
सत्य बता उस समर भूमि में,
रानी किससे हारी थी||
दो क्षण सांसे रोकी होती,
सिर झुकता अभिमानी का|
लिखते-लिखते……………….……….||
तेरे ऊपर दुर्गा थी अरु,
पृष्ट भाग पर दीपक था|
भारत की स्वर्णिम गाथा का,
शब्द-शब्द उद्दीपक था||
ये मन धीरज खोता है,
निज से सबला छली गई|
तस्वीरें कहती है कुछ तो,
मूक बधिर हो चली गई||
जब तक सूरज चंदा धरती,
गान रहे मर्दानी का|
लिखते-लिखते चूक…………………….||
है प्रश्न तुझी से हे!तड़ाग,
तू भी कुछ कर सकता था|
सोखा होता पानी खुद में,
लघुता को धर सकता था||
विजय वरण रानी को करती,
गाथा गूंजे अम्बर में||
काश!अगर ऐसा कर लेता,
होती पूजा घर-घर में||
लिखे गये है पृष्ट बहुत से,
जुड़ता अर्थ रवानी का|
लिखते-लिखते……………….…………..||
कैसा वह समय रहा होगा,
धरती माँ ओ धरती माँ|
अम्बर तू ही फट जाता तब,
रौद्ध रूप धर लेती माँ||
दीनबंधु तुम ही आकर तब,
उसका साथ निभा देते|
बनकर रानी की परछाई,
रिपु को सबक सिखा देते||
तनिक सहारा जो पाती तो,
रखती रूप भवानी का|
लिखते-लिखते……………….………….||
#जितेन्द्र चौहान “दिव्य”