जमी थी महफ़िल हुश्न-ओ-शवाब की, उनके साथ डूबना भा गया।
निहारा जब नयन-ए-शराब को, तो मुझे अजीब नशा छा गया।।
समेट लायी हूं मैं यादों में, झील किनारे बिताए खुशनुमा पल।
इन शरारती नजरो को उनका, इस अदब से मुस्कराना खा गया।।
ना जाने कैसी अजब कशिश है, उस शख्श-ए-ख्वाब में।
उसके मीठे बोलों पर मुझे, कुछ असीमित सा प्यार आ गया।।
चैन-ए-सुकूँ भी मैंने खोया, नींद-ए-ख्वाब भी ना आये रात।
यादों में गुजारा हर लम्हा, कुछ यू हकीकत सामने ला गया।।
ना तमन्ना रही मुझे कोई, ना कोई तलब स्वाद-ए-शराब की।
उसके लबों का स्पर्श लगा जैसे, कोई मदिरा का प्याला पा गया।।
कभी डूबती कभी तैरती रही, खुदगर्ज के ख्याल-ओ-ख्वाब में।
होश यू गवाए “मलिक” की, नाम तेरा बदनाम में आ गया।।
#सुषमा मलिक
परिचय : सुषमा मलिक की जन्मतिथि-२३ अक्टूबर १९८१
तथा जन्म स्थान-रोहतक (हरियाणा)है। आपका निवास
रोहतक में ही शास्त्री नगर में है। एम.सी.ए. तक शिक्षित
सुषमा मलिक अपने कार्यक्षेत्र में विद्यालय में प्रयोगशाला सहायक और एक संस्थान में लेखापाल भी हैं।
सामाजिक क्षेत्र में कम्प्यूटर प्रयोगशाला संघ की महिला प्रदेशाध्यक्ष हैं। लेखन विधा-कविता,लेख और ग़ज़ल है।
विविध अखबार और पत्रिकाओ में आपकी लेखनी आती रहती है। उत्तर प्रदेश की साहित्यिक संस्था ने सम्मान दिया है। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी आवाज से जनता को जागरूक करना है।