न समझ ख़ामोशी को,
मेरी मजबूरी जानेमन ।
मेरे इश्क की ताक़त से,
है मज़बूत ये बंधन ।।
तेरे इश्क में जिंदगी,
पुरनूर है, रोशन है ।
बिन तेरे पतझड़ सब,
मुरझाया सावन है ।।
ताक़त है रिश्तों में अपने,
महक वफ़ा की आती है ।
तेरी सांसों के संदल से,
धड़कने महक जाती है ।।
#डॉ.वासीफ काजी
परिचय : इंदौर में इकबाल कालोनी में निवासरत डॉ. वासीफ पिता स्व.बदरुद्दीन काजी ने हिन्दी में स्नातकोत्तर किया है,साथ ही आपकी हिंदी काव्य एवं कहानी की वर्त्तमान सिनेमा में प्रासंगिकता विषय में शोध कार्य (पी.एच.डी.) पूर्ण किया है | और अँग्रेजी साहित्य में भी एमए किया हुआ है। आप वर्तमान में कालेज में बतौर व्याख्याता कार्यरत हैं। आप स्वतंत्र लेखन के ज़रिए निरंतर सक्रिय हैं।
Wed Jun 20 , 2018
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