कश्मीरः लात और बात, दोनों चलें

vaidik
कश्मीर में शस्त्र-विराम को विराम देकर भारत सरकार ने बिल्कुल ठीक कदम उठाया है। एक महिने तक चले इस एकतरफा शस्त्र-विराम का नतीजा क्या निकला ? सरकार और फौज ने तो हथियार नहीं चलाए लेकिन आतंकवादियों ने बड़ी बेशर्मी से अपनी खूरेंजी जारी रखी। 41 लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए। पत्थरबाजी भी चलती रही। सबसे दुखद बात यह हुई कि वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या की गई। इतना ही नहीं, इस एक माह में आतंकवाद की 50 घटनाएं हुईं जबकि पिछले माह में सिर्फ 19 घटनाएं हुई थीं। अर्थात आतंकवादियों ने शस्त्र-विराम का जमकर फायदा उठाया। इस बीच पाकिस्तान ने मई 2018 तक साल भर में 1252 बार युद्ध-विराम का उल्लंघन किया, जबकि 2017 में उसने 971 बार, 2016 में 449 और 2015 में 405 बार किया था। कुल मिलाकर शस्त्र-विराम की पहल बेकार सिद्ध हुई। उसे छोड़ना बेहतर हुआ लेकिन विरोधी दलों के इस बयान में कुछ दम जरुर मालूम पड़ता है कि इस शस्त्र-विराम को लागू करनेवाली सरकार ने उसमें अपना दिमाग नहीं लगाया। शस्त्र-विराम के साथ-साथ अलगाववादियों से गुपचुप या खुले-आम संवाद चलाया जाना चाहिए था। पाकिस्तान से भी बात की जानी चाहिए थी, जैसा कि अटलजी ने किया था लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इस सरकार के नेताओं की समझ काफी उथली है। अगर उन्हें इन कूटनीतिक बारीकियों का ज्ञान होता तो आज मालदीव, नेपाल, बर्मा और श्रीलंका जैसे पड़ौसी देश चीन की गोद में क्यों जा बैठते ? दुर्भाग्य यह है कि मोदी सरकार की अनुभवहीनता अपनी जगह है लेकिन उसमें साहस की भी बहुत कमी है। उसने कश्मीरियों के साथ संवाद करने के लिए एक सेवा-निवृत्त अफसर को जुटा रखा है। उसके पास योग्य लोगों का सर्वथा अभाव है। लेकिन कश्मीर में सख्त फौजी कार्रवाई करने से उसे कौन रोक रहा है ? वह ईंट का जवाब पत्थर से क्यों नहीं देती ? बात और लात वह साथ-साथ क्यों नहीं चलाती। वह फर्जीकल स्ट्राइक को सर्जिकल स्ट्राइक क्यों कहती है ? चेचन्या के इस्लामी उग्रवादियों का सफाया रुसी नेता पुतिन ने आखिर कैसे किया था ? कश्मीर के आतंकवादियों को जो भी मदद कर रहा हो, उसकी जड़ों में जब तक भारतीय फौज मट्ठा नहीं पिलाएगी, उसकी हर पहल, चाहे वह शस्त्र-विराम की हो या संवाद की, वह विफल हो जाएगी।
                       #डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।