रक्तधार से सिंचित होकर क्षात्र तेज पाता है, अग्निशिखा के आगे जैसे तृणदल जल जाता है, समरभवानी को शोणित का वे नैवेद्य सराते, मातृभूमि को शत्रुमुण्ड अवगुंठित हार चढ़ाते, अरि सेना का काल बने हैं जिनके सबल भुजदंड, कोटि रश्मियों में भासित हैं समरशूर मार्तंड, शौर्य तेज से दग्ध शत्रुदल […]
काव्यभाषा
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