मैंने बोया, एक बीज शब्द का.. मरुस्थल में। वहां लहलहाई शब्दों की खेती, फिर बहने लगी एक नदी.. शब्दों की कविता बनकर उस मरुस्थल में। एक दिन कुछ और नदियाँ, शब्दों की आकर मिली.. उसी मरुस्थल में, और बन गया एक सागर शब्दों का मरुस्थल में। अब मरुस्थल, मरुस्थल नहीं […]
काव्यभाषा
काव्यभाषा
घर आँगन फुदकती चिड़िया, मेरे मन को भाती चिड़िया। सांझ-सबेरे गाती चिड़िया, नित उठ दाना खाती चिड़िया। कुल्हड़ पानी पीती चिड़िया, बेटी मेरी बनती चिड़िया। फुदक-फुदक के नाच दिखाती, सबका मन बहलाती चिड़िया। जंगल प्रतिदिन जाती चिड़िया, तिनका चुन-चुन लाती चिड़िया। घर में नीड़ बनाती चिड़िया, अंडे-बच्चे पाले चिड़िया। माँ […]
