“इंसान हूँ”

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keshav
मैं इंसान हूँ,इंसान!
माना कि!दुनिया में,
हालात का मारा हूँ,
मैं एक बेसहारा हूँ,
जीती बाजी हारता हूँ,
लेकिन!मैं टूटता नहीं,
कड़े पत्थरों के तरह,
डटकर खड़ा रहता हूँ,
एक सिपाही की तरह,
फिर सामना करता हूँ,
मैं इस उम्मीद में,की!
अब मैं जीत जाऊंगा।
मैं सपने भी देखता हूँ,
मैं अपने भी देखता हूँ,
मैं पतझड़ भी सहता हूँ,
तेज ताप भी सोखता हूँ,
हर दफे कुछ सीखता हूँ,
और कुछ भूल जाता हूँ,
क्योंकि!
मैं हर एक नया सवेरा,
और हर एक नयी सांझ,
इस उम्मीद से जी रहा हूँ,
की अब मैं जीत जाऊंगा।
मैं कभी भी!
कठिनाइयों में बिखरा नहीं,
दुःखों से भी घबराया नही,
मेरे लिए कोई पराया नहीं,
सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है,
हम सभी मे व्याप्त प्यार है,
और सभी का यही स्नेह!
मुझे कभी भी टूटने नहीं देती,
आंसू आंखों से छूटने नहीं देती,
मेरे दिल में उम्मीद जगाती है,
एक नया अहसास दिलाती है,
की!मैं कोई टूटा पत्थर नहीं,
जो फिर से जुड़ ना पाऊंगा,
मैं एक इंसान हूँ,इंसान!
अब मैं जीत ही जाऊंगा।।

            #केशव कुमार मिश्रा

 परिचय: युवा कवि केशव के रुप में केशव कुमार मिश्रा बिहार के सिंगिया गोठ(जिला मधुबनी)में रहते हैं। आपका दरभंगा में अस्थाई निवास है। आप पेशे से अधिवक्ता हैं।

Arpan Jain

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।