मृत्युदंड

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prabhat dube
अदालत के बाहर पुलिस से घिरा शाजिद मौन धारण किए खड़ा था,जैसे उसे मृत्यु बोध का आभास हो। बाहर निकलते ही इरफान साहब को देखते शाजिद चिल्ला उठा-अब्बू आपने ये ठीक नहीं किया।इरफान साहब रुके और शाजिद के पास जाकर-क्या अभी भी तुझे ऐसा लग रहा है कि मैंने ठीक नहीं किया?
हाँ,हाँ,अपने ठीक नहीं किया।
मैं एक न्यायाधीश हूँ,तेरा अब्बू नहीं। तूने जो गुनाह किए,उसके लिए अगर मैं तुझे माफ कर देता तो ऊपरवाला मुझे कभी माफ नहीं करता।
माफ नहीं करता ?अरे आप बाप के नाम पे कलंक हो।
शाजिद अपनी सारी सीमाओं को,आज लांघ चुका था।
और तूने जो दुष्कर्म उस लड़की के साथ किया उसके लिए क्या मैं तुम्हे इंसान पे कलंक न कहूँ।
अब्बू आप रहने दो,आप अपनी ईमानदारी का बखान न करो।
आज भी तुझे अफसोस नहीं हो रहा शाजिद ?
अफसोस! किस बात का ? न्यायाधीश  का बेटा हूँ,अगर कुछ मजे ले भी लिए तो क्या फर्क पड़ता था।
क्या तुझे कुछ भी फर्क नहीं पड़ा आज भी ?
अरे जाओ अब्बू,जमाना आपको कभी माफ नहीं करेगा। आप तड़पोगे अपने ही दिए फैसले पर,लोग जब आपसे सवाल पूछेंगे अपने ही बेटे पर आपने मृत्युदंड का फैसला कैसे सुनाया। तब आप क्या जवाब देंगे ?
इरफान साहब अपने को रोक न पाए,मैं तुमसे एक बात पूछूं!जवाब दोगे ?
अरे आपका हर सवाल मेरे लिए कांटे से कम नहीं,लेकिन आप पूछ ही लो। मुझे मलाल नहीं रहेगा कि आपके सवालों का जवाब दिए बगैर मैं चला गया। आप पूछ ही लो।अगर तेरी बहन अमीना के साथ किसी ने ऐसा कुछ किया होता,जो तुमने उस लड़की के साथ किया तो तुम क्या करते ? आज भी तुझे अपने कुकर्मों पर अफसोस के बजाए गर्व हो रहा है। मैं आज खुशी महसूस कर रहा हूँ अपने फैसले पर और इस फैसले पर हमेशा मुझे फक्र महसूस होगा। जब भी किसी बड़े पद पर बैठे इंसान का कोई रिश्तेदार या बेटा गलत करेगा,उसे मेरे इस फैसले के बारे में सोचना होगा। वो हमेशा यह महसूस कर फैसला देगा कि,अगर उसके साथ होता तो ? मैंने तुझे मृत्युदंड दिया,इससे भी ज्यादा कोई दंड होता तो मैं वो फैसला देता,लेकिन मेरे पास तेरे कुकर्मों के लिए कानून का एक ही सबसे बड़ा दंड था,और वो था मृत्युदंड। ले जाइए इसे मेरी आँखों से दूर।
न्यायाधीश साहब के जाने के बाद शाजिद फिर चिल्लाया-सच कहा अब्बू,अगर मेरी बहन अमीना के साथ ये सब होता तो मैं क्या करता ? हाँ, हाँ, अपने ठीक फैसला सुनाया अब्बू। हाँ, हाँ,आपने ठीक फैसला सुनाया। मेरे कुकर्मों के लिए मृत्युदंड दंड ही मेरा प्रायश्चित है,हाँ मृत्युदंड ही…।
                                                                       #प्रभात कुमार दुबे 
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।