दहेज़ का दानव

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भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से अनेक शिष्टाचारों का प्रचलन रहा है। उस काल में विवाह संस्कार एक सामान्य शिष्टाचार था। विवाह के अवसर पर पिता स्वेच्छा से अपने सामर्थ्य के अनुसार कन्यादान के रूप में कन्या को कुछ उपहार देता था। उनकी हमेशा से शुभकामना होती है कि,कन्या अपनी ससुराल में सुखी-सम्पन्न रहे,इसलिए दहेज़ के रूप में आवश्यक घरेलू चीजें दी जाती थी।
परवर्ती काल में कुछ लोग अपना बड़प्पन जताने के लिए अधिक दहेज़ देने लगे,इसलिए कि कन्या ससुराल जाकर दहेज़ की बदौलत महारानी बने। देवरानी,जेठानी से कहीं अधिक दहेज़ लाने की कोशिश करती है,फलस्वरूप कुछ समाजों में एक व्यवस्था बन गई और कन्या को भार माना जाने लगा।
उन्नीसवी सदी में नव निर्माणित दहेज़ व्यवस्था एक विकराल रूप लेने लगी,एक-दूसरे से अधिक दहेज़ देने की होड़ मची। वर्तमान में तो स्थिति अत्यंत विकृत हो गई है। चकाचौंध भरे जीवन में कन्या के ससुराल वाले दहेज़ की लंबी-सी सूची बनाने लगे हैं,और तो और मनचाहा दहेज़ न मिलने पर नववधू को परेशान करते हैं। पैसे वालों की चिन्ता नहीं,पर माध्यम वर्ग तथा पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए इससे कन्या भार बन गई है। कन्या का जन्म होते ही चेहरा फीका पड़ जाता है,साथ ही भविष्य की चिंता से व्याकुल हो उठते हैं-वजह है दहेज़। इस विकृत दहेज़ प्रथा के कारण कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराई का जन्म हुआ है, जिसमें कन्या को कोख में ही खत्म कर दिया जाता,कचरे के डिब्बे में या सुनसान जगह पर फेंकने जैसी घटनाएं होने लगी हैं। दहेज़ प्रथा के कारण कन्या का जन्म अभिशाप बन गया है। लड़के-लड़की के बीच भेदभाव की खाई और गहरी हो गई है। कन्या सुख-चैन के लिए तरस गई ,क्योँकि परिवार के अन्य सदस्य ताना मारते थे। फलस्वरूप घरेलू कलह का जनम हुआ। नववधू केसाथ मारपीट करना व जलाकर मारने की भी घटनाएं होने लगी। कई कन्याओं के हाथों में मेंहन्दी लगी ही रह जाती थी,और न केवल कन्या बल्कि,पूरे परिवार को शर्मशार होना पड़ता है,तो क्या हम अपनी कन्या की खातिर दहेज़ प्रथा मिटा नहीं सकते हैं?
दहेज़ प्रथा की रोकथाम के लिए शिक्षा जागरुकता जरुरी है,विशेषकर बालिका शिक्षा। साथ ही महिलाओं को रोजगार के समान अवसर देना,ताकि लड़के तथा लड़की के भेद को मिटाया जा सके। जब तक दहेज़ अधिनियम को कठोरता से लागू करके समाज को जाग्रत नहीं किया जाएगा,तब तक  भ्रूण हत्या भी नहीं रुकेगी।
                                                                                                    #एल.आर. सेजू
परिचय : एल.आर. सेजू थोब राजस्थान की तहसील ओसिया(जिला जोधपुर) में रहते हैं।आपको हिन्दी लेखन का शौक है। अधिकतर लेख लिखते हैं।
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।