लेखनी कब तक कठघरे में

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साहित्य सिर्फ समाज का दर्पण ही नहीं होता,बल्कि समाज को परिष्कृत कर नई दिशा भी सुझाता है….दिखाता है…..पहला कदम बढ़ाता है और इसके लिए साहित्यकार न जाने कितनी रातें और कितने दिन कुर्बान कर मानसिक रूप से वहाँ हो आता है ….उसको जी लेता है। सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव की गहन मीमांसा करके समाज के सामने प्रस्तुत करता है।
साधारणतया मनुष्य स्वभाव से ही आदतों की परिधि से घिरा होता है और उससे बाहर निकलना नहीं चाहता है , जैसे कि लोहे की जंजीर से बँधा हाथी का चंचल बच्चा बड़ा होकर पूर्ण बलशाली होने पर भी आदतानुसार जंजीर को तोड़ने का प्रयास नहीं करता ….।
एक कवि जब लेखनी द्वारा लीक से हटकर कुछ अन्य राह दिखाता है,तो बहुतायत जनसंख्या नज़रअंदाज़ कर देती है या विरोध करने पर उतर आती है। लेखनी प्राय: अलग-थलग पड़ जाती है। परिणामत: कुछ जर्जर हो जाती है तो, कुछ मृतप्राय, कुछ हताहत तो कुछ अडिग।
जो लेखनी अडिग रह जाती है,वह नि:संदेह परिवर्तन का बीज बो देती है,किन्तु तिरस्कार सहते-सहते या सफाई देते-देते अक्सर ही दम तोड़ देती है। उसके द्वारा बोया गया बीज लम्बे अर्से के बाद उभर ही आता है….परिवर्तन होने लगता है। तलाश शुरु हो जाती है फिर बीजारोपण करने वाली लेखनी की…उच्च कीमत…उच्च सम्मान की झड़ी लग जाती है। पैदा होने लगते हैं कुकुरमुत्ते की तरह वारिस….। नाम,यश,प्रशस्ति और जीवन भर देने का दीर्घकालीन खेल मरणोपरान्त या मरणासन्न समय में अबाध चलता है। अब सवाल यह उठता है कि, ऐसा क्यों होता आ रहा है सदियों से और रुकेगा कैसे ?
इसके लिए लेखनीकारों और प्रबुद्धजनों को दृढ़ संकल्प लेकर लेखनी को सत्ता के गलियारे से आजाद कराना होगा। चाटुकारिता के चालीसे को हतोत्साहित करना होगा। रचना का उचित मूल्यांकन करना होगा। कोई रचनाकार परिवर्तन की बात करता है तो उससे मिलकर उसकी सम्भावना पर विमर्श करना होगा और संतुष्ट होने पर समर्थन व सम्मान की मुहिम चलानी होगी। लेखनी को कठघरे में खड़ा करना गलत नहीं,किन्तु जिरह-बहस की अवधि कम करके न्याय की व्यवस्था शीघ्रातिशीघ्र करना होगा,ताकि लेखनी झंझावात से टकराते-टकराते बेचारगी (अपराध-बोध) का भाव लिए आत्महत्या न कर ले….भीड़ में गिरकर गलत की समर्थक न हो जाए…..मृतप्राय न हो जाए ….।
अगर हम सबके जागरुकता पूर्ण प्रयास से लेखनी उन्नयन के दौर में ही सही न्याय पा जाए तो उसे लम्बी अवधि तक कठघरे में नहीं रहना पड़ेगा……..लेखनी अपने उद्देश्य में सफल होकर जल्दी ही समाज को सही दिशा दे सकेगी…..नई कलमें भी विकास का पंख फड़फड़ाएंगी…….। कोई ‘निराला’ अभाव में परिजनों को नहीं खोएगा…….कोई ‘सुकरात’ ज़हर नहीं पिएगा…….कोई ‘महादेवी वर्मा’ सार्वजनिक मंच का त्याग नहीं करेगी….कोई ‘दिनकर’ परशुराम की प्रतीक्षा करते नहीं मरेगा।
आइए,इसके हेतु कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ें।

#अवधेश कुमार ‘अवध’

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।