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kaji
खामोश समंदर की लहरें,
खामोशी से उठती हैं।
अंधियारे में कोई शमा,
जलती और बुझती है।।

तूफानी रफ्तार से भी,
जब लहरें उठती हैं।
हिला देती जहाज़ को,
रोके न रुकती है।।

वक्त चलता जाता है,
लहरों की तरह।
दुश्मन से भी मिलिए,
अपनों की तरह।।

                                                                                 #वासीफ काजी

परिचय : इंदौर में इकबाल कालोनी में निवासरत वासीफ पिता स्व.बदरुद्दीन काजी ने हिन्दी में स्नातकोत्तर किया है,इसलिए लेखन में हुनरमंद हैं। साथ ही एमएससी और अँग्रेजी साहित्य में भी एमए किया हुआ है। आप वर्तमान में कालेज में बतौर व्याख्याता कार्यरत हैं। आप स्वतंत्र लेखन के ज़रिए निरंतर सक्रिय हैं।

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http://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2017/02/kaji.pnghttp://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2017/02/kaji-150x150.pngmatruadminUncategorizedकाव्यभाषाkaji,wasifखामोश समंदर की लहरें, खामोशी से उठती हैं। अंधियारे में कोई शमा, जलती और बुझती है।। तूफानी रफ्तार से भी, जब लहरें उठती हैं। हिला देती जहाज़ को, रोके न रुकती है।। वक्त चलता जाता है, लहरों की तरह। दुश्मन से भी मिलिए, अपनों की तरह।।                              ...Vaicharik mahakumbh
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