सोशल मिडिया के माध्यम से हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार 

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sanjay
वर्त्तमान समय में जिस तरह से हिंदी भाषा के उठान के लिए सोशल मिडिया ने जो कार्य किये है वो बहुत ही सराहनीय है। जिसके कारण आज सरे विश्व में हिंदी भाषा को सराहा जा रहा है। भारतीय संस्कृति का मूल आधार है हमारे देश की भाषा। आज देश में भिन्न भिन्न भाषाएँ और जाते के लोग है जो अपने अपने स्टार पर अपनी संस्कृति और अपनी भाषा को अपनाते है। ये सब होते हुए भी भारतीय संस्कृति हिंदी भाषा पर आधारित है। हिंदी भाषा हमारी मृातभाषा है और हम हिंदुस्तानियों के शरीर मे खून की तरह से समाई हुई है। भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां पर  सदियों से हिंद भाषा का बोलबाला रहा है। बीच मे जब देश गुलाम हुआ तब अंग्रेजो ने हिंदी का अफमान किया और अपनी भाषा को भारत देश के ऊपर थोप  दी परन्तु फिर भी वो लोग हिंदी भाषा का बोलबाला को ख़त्म नहीं कर सके थे । जब हम लोगो अपनी आजादी की लड़ाई की तैयारी कर रहे थे तब सभी जाति समूह के लोग अपनी बातें हिंदी में ही रखते थे। परन्तु आजादी के बाद चंद स्वार्थी लोगो ने अपने आप को विध्दामान सिद्ध करने के लिए अंग्रेजी को बढ़ावा दिया।  हम सब अंग्रेजी भाषा की ओर वहाने लगे। समय ने एक बार फिर करवट ली और पुनः हम लोग अपनी मृातभाषा की ओर वापिस हुए। इस कार्य मे सबसे बड़ा योगदान हमारे देश के लेखक और विध्दामान लोगो का रहा जिनके अथक प्रयासों से हम लोगो हिंदी भाषा को अपनी राष्ट्रीय भाषा बनवा सके, और फिर इस भाषा को और बढ़ावा देश के नाटक मंडलियों और चित्र पट और छोटे छोटे नुकड़  सभाओ को जाता है, जिन्होंने हिंदी भाषा को अपनाकर इससे अपने कार्यशैली में शामिल किया। 80 के दसक आते आते हिन्द भाषा हर किसी के जुबान पर आने लगी और सभी लोग हिंदी को अपनाने लगे, चाहे  वो किसी भी भाषा का ज्ञाता क्यो न हो हिंदी बोले और सुनने के लिए आतुर हो उठा। इसका श्रेय उन गीतकार और संगीतकार और लेखकों, कवियों  को देना चाहूंगा जिन्होंने हर किसी की जुबा पर हिंदी के गीत गुन गुनाने के लिए मजबूर कर दिया। रेडियो स्टेशन से अनेक कार्यक्रम जैसे कृषि से संबंधित महिलाओ से संबंधित और मनोरंजन आदि के लिए प्रसारण किये जाने लगे और जिसके कारण भी हिंदी भाषा का बोलबाला हमारे देश मे बढ़ाने लगा। आप देख सकते है कि कितने गायक कर्नाटका बंगाल और भी अनेक भाषाओं के होने के बाद भी गीत हमेशा हिंदी में गाते थे। जिसके कारण उन सभी लोगो को प्रसिध्दि भी मिले। उन्होंने अपनी आवाज़ से भी हर दिलो में हिंदी को जगह दिलाई । समय आगे बढ़ा और विज्ञान ने भी तरक्की की और दूरदर्शन आ गया और जो कार्यक्रम हम लोग रेडियो स्टेशन के माध्यम से सुनते या नाटकों में देखते थे वो अब चल चित्रो के माध्यम से हिंदी में देखने और समाझ्ने लगे। देश के साथ विदेशी सोशल मीडिया भी अपनी लोकप्रियता बढ़ाने और अपने कार्यक्रमो को जन जन तक पहुंचने ले लिए हिंदी भाषा का ज्यादा से ज्यादा उपयोग अपने हर कार्यक्रमो में करने लगा। नतीजा यह हुआ कि हिंदी भाषा हमारे देश के साथ विदेशियों की जुबान पर आने लगी और विदेशी लोग हिंदी पढ़ने आदि के लिए हमारे यहां के विधायालयो में आने लगी। जब कोई भी हिंदी भाषा का जिक्र विदेशो में करता है तो हमारे देश का गौरव बढ़ाता है। आ. अटल जी देश के एक मात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने सर्व प्रथम अपने देश की भाषा मे विदेशो के मंच से सभी विश्व के देशों को हिंदी में संबोधन किया था और एक कीर्तिमान बनाया था ।
आज तो लगभग 90% कार्यक्रम टेलीविजन या सिनेमाओं या रेडियो स्टेशन आदि से हिंदी में ही प्रसारित होते है और जो जन जन तक बड़ी सरल हिंदी भाषा के द्वारा पहुँच रहे है ।
अतः हम कह सकते है कि सोशल मीडिया का हिंदी भाषा को विश्व में उच्च स्थान दिलाने में बहुत बड़ा योगदान है।
फूल खिलकर भी उदास है।
समुद्र को आज भी पानी की प्यास है।
एक बार अपनी राष्ट्री भाषा को,
दिल से अपनाने के तो देखो,
हर दिलो में ख़ुशी के कमाल खिलेगा।
और चारो तरफ तुम सभी को,
विकास ही विकास दिखेगा है।।
मैंने एक छोटा सा प्रयास किया है लेख लिखने का अपनी राष्ट्री भाषा पर कितना सफल हुआ ये आप सभी की प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
यदि कही कुछ गलतियां हीउ हो तो क्षमा करे।

#संजय जैन

परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों  पर भी दिखा चुके हैं। इसी प्रतिभा से  कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें  सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखते हैं। मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की  शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है,जबकि लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।