हिन्दी भाषा के प्रचार में भारतीय मीडिया की भूमिका

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प्रत्येक मीडिया भाषा के बिना अधूरा है। भाषा ही मीडिया को वाङ्मय एवम् प्रचालमान बनाए रखती है। मीडिया समाज का एक ऐसा माध्यम है, जो पारिवारिक स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक समाज को समाज से परिचित करवाने का श्रमसाध्य कार्य करता है। भाषा उसके इस कार्य में संगिनी की भांति सदैव साथ देती आई है। दुनिया के हर निवास क्षेत्र में भाषा और मीडिया का उद्गम मानवीय संवेदनाओं की प्रथम प्रस्तुति के साथ जुड़ा हुआ है। प्रकृति इस बात की साक्षी है कि मानवीय संवेदनाओं को सर्वप्रथम भाषा विशेष ने ही स्वर प्रदान किए और मीडिया अर्थात् माध्यम ने इन स्वरों को संचार और प्रचार की ऊर्जा प्रदान की। तब से भाषा और मीडिया मानवीय संवेदनाओं के मार्गप्रशस्तक बनते गए।स्वरुप परिवर्तन एक शाश्वत प्राकृतिक प्रक्रिया मानी जाती है, भाषा और मीडिया भी इन प्रक्रिया से गुजरते हुए क्रमशः आधुनिक होते आए हैं।वर्तमान में दोनों अपने डिजिटल स्वरुपों में अपनी अपनी स्वतंत्र सशक्त छवि से समृद्ध हैं। अत्याधुनिक डिजिटल समृद्धि का यह समीकरण विश्व की समस्त भाषाओं और मीडिया पर समान रुप से लागू है।हिन्दी भाषा और भारतीय मीडिया इससे पृथक बिल्कुल नहीं हैं।विश्व की पुण्यभूमि भारत पर भारतीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति में भाषा के तौर पर हिन्दी ने और समाचारपत्रों से लेकर रेडियो टेलिविजन तक के अपने विविध स्वरुपों में भारतीय मीडिया ने बहुत कुछ सराहनीय और अनुकरणीय किया है। वर्तमान में हिन्दी और भारतीय मीडिया अपने वर्चस्व के शिखर पर परम योग्यता का ध्वज लिए अविचल शोभायमान हैं।

हिन्दी और भारतीय मीडिया की इस शोभनीय छवि में एक दूसरे का कितना योगदान है, यह विषय अलग अलग लोगों के विषम दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। कोई यह कह सकता है कि भारतीय मीडिया ने हिन्दी के प्रचार प्रसार में अधिक योगदान दिया है। ऐसी विचारधारा रखने वाले लोग यह मानते हैं कि हिन्दी आज जो विश्व पटल पर परचम लहरा रही है, उसे वहां तक पहुचाने में भारतीय मीडिया ने सहयोग प्रदान किया है। इस धारणा के लोग मानते हैं कि मीडिया ही एकमात्र प्रचार और प्रसार का सशक्त साधन होता है। निःसंदेह वे काफी सीमा तक सत्य भी हैं, क्योंकि वैचारिक, प्रशासनिक, रोजगारपरक, शैक्षणिक और आर्थिक उत्पादों का प्रचार प्रसार मीडिया के द्वारा ही सम्भव है। लेकिन इस अभिधारणा से कोई भाषाविद् कैसे पूर्णतया सहमत हो सकता है कि मीडिया भाषा का प्रचार प्रसार कर सकता है, क्योंकि वे इसे कदापि स्वीकार नहीं कर सकते कि एक भाषा किसी उत्पाद की मानिंदमीडिया के हाथों प्रचारित या प्रसारित हो सकती है। इसका कारण यह है कि उनकी दृष्टि में भाषा किसी के प्रचार का माध्यम भले ही बन जाए, परंतु किसी के माध्यम से उसे प्रचारित होना पड़े यह स्वयं की उसकी न्यूनता की निशानी होगी। हिन्दी भाषा के संदर्भ में इस विषय को विश्लेषित किया जाए, तो भी दो बातें सामने आती हैं, पहली कि क्या हिन्दी इतनी अशक्त है कि उसे प्रचारित करने के लिए मीडिया की बैसाखियों की आवश्यकता है और दूसरी कि क्या वास्तव में भारतीय मीडिया हिन्दी को उसके विशुद्ध मूलरुप में प्रचारित या प्रसारित कर रहा है।इन दोनों तथ्यों को सम्मुख रखते हुए एक बात तो निश्चिततौर पर स्पष्ट है कि हिन्दी भाषा और भारतीय मीडिया ने आपस में एक दूसरे को लाभांवित अवश्य किया है।

आइए, सर्वप्रथम हिन्दी भाषा को भारतीय मीडिया के ऊपर रखते हुए भूमिकाई आधार पर विश्लेषण करते हैं। हिन्दी अपने संस्कृत उद्भवित पालि, प्राकृत स्वरुपों से लेकर देवनागरीय खड़ी बोली और विशुद्ध साहित्यिक स्वरुपों से होते हुए उर्दूमिश्रित हिन्दुस्तानी और अंग्रेजी मिश्रित तथाकथित हिंग्लिश स्वरुप में आ चुकी है। यह कहा जा सकता है कि हिन्दी इस समय अपने सबसे विकृत स्वरुप के दौर से गुजर रही है। हिन्दी भाषा की वर्तनी, व्याकरण और व्यंजना को इस स्थिति में पहुंचाने में बहुत बड़ा हाथ उसकी सरलीकरण प्रक्रिया का रहा है। हिन्दी को क्लिष्ट भाषा समझने और बतलाने वाले चंद बुद्धिजीवियों ने हिन्दी को उसके सरल स्वभाव के लिए छला है। विडम्बना यह है कि इस छलावे में कहीं न कहीं भारतीय मीडिया ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग दिया है।

एक समय था जब जनसत्ता और नई दुनिया जैसे समाचार पत्र और धर्मयुग एवम् साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएं बच्चों को विशुद्ध हिन्दी सिखाने के मीडियाई मानदण्ड हुआ करती थीं। वर्तमान में ऐसा कोई भी दृश्य-श्रृव्य भारतीय मीडिया शेष नहीं है जिसे हिन्दी के मानदण्डों पर आदर्श माना जा सके। आज स्थिति यह है कि आंकड़ों में हिन्दी मीडिया में बढ़ रही है, लेकिन उसकी विशुद्धता उसी अनुपात में घट रही है। कम्प्यूटर युग में एक तरफ हिन्दी नित नए सॉफ्टवेयरों के आगमन से डिजीटलीकृत होकर विश्व के कोनों में पहुंच गई है। वहीं सोशल मीडिया ने हिंदी को आम लोगों की भाषा बनाकर साहित्य से बहुत दूर कर दिया है। प्रिंट मीडिया, दृष्य-श्रृव्य मीडिया और सद्योद्भवित सोशल मीडिया ने हिन्दी को मूल साहित्यिकता से पृथक करके एक नए सस्ते मनोरंजन देने वाले साहित्य से भर दिया है। इन वाटसैपी विनोदिनी हिन्दी में भाषा स्वयं को खोजती सी रह जाती है। इस तरह हिन्दी के इस उपरिविश्लेषण से हम यह कह सकते हैं कि हिन्दी ने अब तक के अपने विविध स्वरुपों का उपयोग करवाते हुए सभी तरह के भारतीय मीडिया को लाभ ही पहुंचाया है। अर्थात् इसमें हिन्दी भाषा की भूमिका भारतीय मीडिया के प्रचार प्रसार में कहीं अधिक योगदान देती सी जान पड़ती है।

अब दूसरे दृष्टिकोण से भारतीय मीडिया को हिन्दी भाषा के प्रचारक और प्रसारक के तौर पर देखते हैं। भारत में मीडिया की शुरुआत उसके समाचारपत्र वाले स्वरुप से हुई मानी जाती है। भले ही भारत वेदों, उपनिषदों की मनीषा से समृद्ध राष्ट्र रहा है, लेकिन श्रुतियां और कथा वाचन व श्रवण प्राचीन भारतीय मीडिया के स्वरुप हुआ करते थे। दीर्घकाल तक भारतीय मीडिया अपने इन्हीं स्वरुपों द्वारा फलता फूलता रहा, जिसमें देश की भाषा विशेष ने अपना अमूल्य योगदान दिया होगा। यह माना जाता है कि भारत में मीडिया के तत्कालीन आधुनिक स्वरुप यानि समाचार पत्रों का प्रचलन यूरोपीय लोग लेकर आए थे। सबसे पहले भारत के गोवा में पुर्तग़ालियों ने 1557 ई. में प्रिंटिग प्रेस के माध्यम सेहमारे यहां पहली पुस्तक छापी थी। फिर 1684 ई. में अंग्रेज़ों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में प्रथम प्रिंटिग प्रेस की स्थापित की थी। समाचार पत्रों के साथ प्रादुर्भाव में आए भारतीय मीडिया में भाषाई बहुलता अंग्रेजी भाषा की थी। उस कालखण्ड में भारतीय प्रिंट मीडिया में कलकत्ता कैरियर, एशियाटिक मिरर, ओरियंटल स्टार, मद्रास कैरियर, मद्रास गजट, हेराल्ड, बांबे गजट,आदि अनेक अंग्रेजी समाचार पत्रों की भरमार थी। हिन्दी भाषा का दूर दूर तक नामोनिशान नहीं था। यद्यपि तब भी हिन्दी एकमात्र वो भाषा थी, जिसने भारत को चारों दिशाओं से बांध रखा था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों में हिन्दी  भूमिका ने भारतीय मीडिया को हिन्दी की उपादेयता समझने के लिए बाध्य कर दिया। फलतः सन् 1826 में ‘उदंत मार्तंड’ नामक हिंदी के प्रथम साप्ताहिक समाचार-पत्र का प्रादुर्भाव हुआ, जो एक साल ही में 1827 में बंद भी हो गया था। हांलाकि इसके पहले 1819 मेंबंगाली भाषाका समाचार पत्र ‘संवाद कौमुदी’ और 1822 में गुजराती भाषा का साप्ताहिक ‘मुंबईना समाचार’ भारतीय मीडिया का भाग बन चुके थे। फिर सन् 1830 में राजा राममोहन राय ने हिंदी साप्ताहिक ‘बंगदूत’ का प्रकाशन शुरू किया, जो हिन्दी के अलावा अंग्रेज़ी, बंगलाऔर फारसी भाषाओं में भी निकाला जाता था। कालांतर में भारत में प्रिंट मीडिया ने अपना विस्तार भाषाई और भौगोलिक तौर पर बहुत बढ़ा लिया। भारत की स्वतंत्रता के बाद हिन्दी भाषा का वर्चस्व भारतीय मीडिया में रंग लाने लगा। पचास के दशक से लेकर अस्सी के दशक के पूर्वार्ध तक हिन्दी अपने विशुद्ध मूल स्वरुप में भारतीय प्रिंट मीडिया में समाचार पत्रों ही नहीं वरन् साप्ताहिक, मासिक, द्विमासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं द्वारा छाई रही।

भारतीय मीडिया को 15 सितंबर, 1959 को अपना दृश्य स्वरुप पहले ‘टेलीविजन इंडिया’ और बाद में दूरदर्शन के नाम से मिला। इसके बाद धीरे धीरे भारतीय मीडिया ने अपने दृश्य स्वरुपों की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए अपने पंख पसारने शुरु कर दिए। परिणामस्वरुप वर्तमान में भारत लगभग 900 अनुमत निजी उपग्रह टेलीविजन चैनलों का स्वामीबन गया है। एक आंकड़े के अनुसार देश में 399 समाचार व करेंट अफेयर्स चैनलों का प्रसारण किया जा रहा है, जबकि मनोरंजन श्रेणी के 487 चैनलों का प्रसारण हो रहा है। इनमें अधिकांश हिन्दी चैनल शामिल हैं। पिछले दो दशकों में भारतीय मीडिया में सूचना क्रांति से जन्मेइंटरनेट संचालित विविध सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, य़ू ट्यूब, लिंक्डइन, विकिपीडिया, वाटसेप, आदि शामिल हो गए हैं। भारत में सन् 1986 में यूनीकोड के आगमन से सोशल मीडिया पर हिन्दी को काफी बढ़ावा मिलना शुरु हो गया था। आज भारत में सोशल मीडिया पर हिंदी सबसे लोकप्रिय भाषा है। भारतीय मीडिया के इन स्वरुपों और उनमें हिन्दी भाषा की लगातार बढ़ रही उपादेयता सीधे सीधे संकेत दे रही है कि भारतीय मीडिया हिन्दी को प्रसारित और प्रचारित करने में बहुमूल्य योगदान दे रहा है।

दोनों ही दृष्टिकोणों से किए गए विश्लेषणों से एक उभयनिष्ठ पहलू यह उभरकर आ रहा है कि हिन्दी भाषा और भारतीय मीडिया एक दूसरे के पूरक बनते जा रहे हैं। लेकिन पारिभाषिक स्तर पर देखें तो हिन्दी भाषा है, जिसका संबंध संवेदनाओं से कहीं अधिक है, व्यावसायिकता उसका मूलस्वभाव नहीं हो सकता। वहीं मीडिया चाहे वह भारतीय मीडिया ही हो, वह पूर्णतया व्यावसायिकता से परिपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें भाषा का प्रयोग करना उसकी आवश्यकता है। भाषा नहीं होगी, तो उसका एक पल भी आगे बढ़ना नामुमकिन होगा। फिर भारत में हिन्दी जैसी समृद्ध और लोकप्रिय भाषा और कोई है ही नहीं जो व्यावसायिक स्तर पर समग्र भारत में मीडिया को लाभांवित कर सके। यहां निःसंदेह भारतीय मीडिया का उत्तरदायित्व बनता है कि वे हिन्दी की विशुद्धता को ध्यान में अवश्य रखें, अब और विकृति हिन्दी से कहीं उसकी निजता को न छीन ले। विकृति कोई भी हो, भले ही वह भाषा की ही हो, उसके दूरगामी परिणाम समाज और देश को भुगतने ही पड़ते हैं। भारतीय मीडिया में हिन्दी की लगातार हो रही भाषाई विकृति भविष्य में कहीं उस पर ही भारी न पड़ जाए, यह बेहद चिंता का और एक अतिशोचनीय पहलू है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय मीडिया हिन्दी भाषा की अपनी प्रचार प्रसार की भूमिका का पूर्णनिर्वहन करते हुए हिन्दी को एक उत्पाद नहीं वरन् एक गौरवशाली भाषा की तरह उपयोग करने का प्रयास करे। इसी में हिन्दी भाषा और भारतीय मीडिया दोनों के भावी हित निहित हैं।

#डॉ. शुभ्रता मिश्रा

वास्को-द-गामा, गोवा

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।