माँ बाप को बच्चे समझे 

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sanjay
आज कल के बच्चे सिर्फ चकाचौंध पर ज्यादा ध्यान देते है । वर्तमान समय में सिर्फ एक ही चीज पर लोग ज्यादा ध्यान क्रेंद्रित करते है, और वो है दिखा । एक माध्यम परिवार का बच्चा अपने माता पिता से आये दिन नई नई चीजो को हमेशा मांगता रहता है, और उसके पिता अपने पुत्र की हर फ़रमायास  को अभी तक पूरा करते आ रहा थे  । एक दिन उसका पुत्र अपने माता पिता से एक मोटरसाइकिल माँगने लगा। जिसको पूरा करना उसके माता पिता के लिए इस समय संभव नहीं था। इस कारण से पुत्र एक दिन गुस्सा हो गया और अपने माता पिता जी के लिए बहुत कुछ उसने सूना दिया, की जब मोटरसाइकिल नहीं दिला सकते तो क्यों, मुझे इंजीनियर बनाने के सपने दिखाते है। उसने मन ही मन फैसला कर लिए की में आज ही घर छोड़कर चला जाऊंगा, और तब तक वापिस नहीं आऊंगा जब तक बड़ा आदमी नहीं बन जाता हूँ । उसने पापा का पर्स चोरी किया और जल्दी जल्दी में भागते हुए जूते पहने के घर से भाग लिया। थोड़ी दूर तक तो जोश में भागता रहा, फिर उसे पैरो में कुछ चुभा तो उसने जूते को खोल कर देखा तो हल्का सा खून निकला हुआ था । कोई जूते की कील चुभने के कारण खून निकला था , थोड़ा और आगे चला तो पैर में कुछ गिला गिला लगा, देखा तो जूते का सोल कटा हुआ था। जिसके कारण सड़क का पानी जूते के अंन्दर आ रहा था । जैसे तैसे चलकर वो बस स्टैण्ड पर पहुँच गया। वहां पर उसे पता चला की एक घंटे तक कोई भी बस नहीं है। तभी उसके दिमाग में आया की हम पापा का पर्स देखते है, इसमें पापा की डायरी भी रहती है । मालूम तो पड़ेगा की कितना पैसा पापा ने  मम्मी से भी छुपाकर रखा है। तभी तो वो अपना पर्स किसी को भी छूने नहीं देते है।  पर्स को खोलने  के बाद जो दृश्य बेटे के समाने आया वो एक दम से चकित रह गया। उसने एक मुड़ी हुई पर्ची को देखकर पड़ा, उसमे ४०,०००/- रुपये का लेपटाप का बिल था और पैसे देना बाकी है उस पर लिखा था, जबकि लेपटाप तो मेरे पास घर पर है । एक और पर्ची पर्स में से निकालकर पड़ी जिसमे लिखा था की वर्मा जी कल से दफ्तार में अच्छी जूते पहन के आना बड़े साहब आ रहे है, जूतो को नहीं खरीदने के कारण  पापाजी उस दिन बीमारी का बहाना बनाकर दफ्तार नहीं गए  । मम्मी भी बहुत दिनों से हर पहली तारीख को बोलती थी,  की आप जूते लेकर आ जाओ परन्तु पापा बोलते थे, की अभी कम से कम 2-३ महीने और चल जायेंगे। एक और उसने पर्ची निकाली उसमे जो लिखा था, उसको पड़कर तो वो एक दम से सकते में आ गया, और सीधा घर की तरफ भागा, क्योकि उस पर्ची पर लिखा था की पुराना स्कूटर के बदले नई मोटरसाइकिल ले । जब वो घर पहुंचा तो पापा जी और उनका स्कूटर घर पर नहीं था, वो समझा गया की वो कहाँ पर गए है । फ़ौरन वो मोटरसाइकिल के शो रूम पर पहुँच गया और उसने अपने पापा जी को गले से लगाकर जो वो रोया । जिसके कारण उनका कन्धा आंसूओ से भिगो दिया।  उसके बाद जो शब्द उसने अपने पापा जी को बोले की नहीं पापा जी मुझे मोटरसाइकिल नहीं चाहिए आप तो पहले जूते खरीदो और अपने लिए कम से कम दो जोड़ी कपड़े ले लो । मै आज से ही आपको वचन देता हूँ की मै अब से बिना फिजूल खर्च किये बिना ही आपके सपनो को साकार करके दिखाऊंगा ।  एक सफल इंजीनियर के साथ ही बड़ा आदमी बन के आपको दिखाऊंगा । फिर दोनों पिता और पुत्र अपने पुराने स्कूटर पर बैठकर ख़ुशी ख़ुशी घर वापिस आ गए । इस तरह से आज के दिन मेरा सही जन्म हुआ है ये शब्द उसने अपने पिता जी को बोला । दोस्तों माँ एक ऐसा बैंक है जहाँ पर आप हर दुःख और सुख जमा कर सकते हो । साथ ही पापा एक ऐसा क्रेडिट कार्ड है, जिनके पास बैलेंस न होते हुए भी हमारे सपने पूरे करने की कोशिस सदा वो करते है । साथियो माँ बाप से बढ़ाकर इस दुनियां में कुछ भी नहीं है । आज वो एक सफल और काबिल इंजीनियर है । उसका जीवन एक छोटी सी घटना ने पूरी तरह से बदल दिया था ।  साथ ही इस घटना ने उसके पूरे जीवन को नई दिशा दी। जिसके कारण ही आज वो कुछ अपने जीवन में कर सका था ।  मां और बाप जो हमारे लिए करते है।  उनके इस कर्ज को सौ जन्म लेने के बाद भी हम और आप नहीं उतार सकते है । हर इंसान के जीवन में कब कौनसी घटना घट जाए और आपका पूरा जीवन उससे बदल सकता है । बस आप सकारात्मक सोच रखो। मेरा लेख उन बच्चो के लिए है जो बिना सोचे समझे अपने माँ  और बाप पर बोझ के साथ मानसिक परेशानियां देते है । उन्हें हकीकत और अपने मां  बाप का परिश्रम आदि को देखना चाहिए।  मेरा ये लेख सभी नव युवको के लिए समर्पित है।

#संजय जैन

परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों  पर भी दिखा चुके हैं। इसी प्रतिभा से  कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें  सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखते हैं। मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की  शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है,जबकि लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।