भूख….

sarla

भूख बेरहम ही तो है,
इंसा को नचा देती है।

इसकी ताकत होती है,
बहुत गज़ब की साथी,
भूख ही झुका देती है..
भूख ही रुला देती है।

दो टुकड़े रोटी के ही,
चोर का ठप्पा लगा देते..
भूख मजबूर बना देती है।

कोई नाचता जश्न महफिल में,
कोई बाजारों में बिक रहा है..
कोई कूड़े से बीनता,
कोई भटकता,पाता तब रोटी।

भूख तो बहुत हरजाई है,
लगती उन्हें कम जहां दौलत..
ये गरीबों को बहुत सताती है।

भूख बढ़ाने के लिए करते,
कुछ जतन पर जतन देखो,
कुछ की भूख ही दुश्मन
करती है बस पतन ही पतन।

ना पूछो भूख की बातें,
इसके भी भेद हो गए कई,
गरीबों के लिए बेदर्द है ये,
अमीरों के घर जरा कम आती है।

भूख बेदर्द है बहुत साथी,
इंसा को नचा देती है ।

#डॉ.सरला सिंह

परिचय : डॉ.सरला सिंह का जन्म सुल्तानपुर (उ.प्र.) में हुआ है पर कर्म स्थान दिल्ली है।इलाहबाद बोर्ड से मैट्रिक और इंटर मीडिएट करने के बाद आपने बीए.,एमए.(हिन्दी-इलाहाबाद विवि) और बीएड (पूर्वांचल विवि, उ.प्र.) भी किया है। आप वर्तमान में वरिष्ठ अध्यापिका (हिन्दी) के तौर पर राजकीय उच्च मा.विद्यालय दिल्ली में हैं। 22 वर्षों से शिक्षण कार्य करने वाली डॉ.सरला सिंह लेखन कार्य में लगभग 1 वर्ष से ही हैं,पर 2 पुस्तकें प्रकाशित हो गई हैं। कविता व कहानी विधा में सक्रिय होने से देश भर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख व कहानियां प्रकाशित होती हैं। काव्य संग्रह (जीवन-पथ),दो सांझा काव्य संग्रह(काव्य-कलश एवं नव काव्यांजलि) आदि पर कार्य जारी है। अनुराधा प्रकाशन(दिल्ली) द्वारा ‘साहित्य सम्मान’ से सम्मानित की जा चुकी हैं।

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