“बात बनाना”

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keshav
जहां में सबको देख-देख कर,
मैं भी सीख गया बात बनाना,
रिश्ते-रास्तों की समानता देख,
मैं भी सीख गया रिश्ते निभाना।
आंखों के काजल को चुराकर,
मैं भी सीख गया आँख चुराना,
अपने को ही बेगाना बनाकर,
सीखा गैरों को अपना बनाना।
सभी मालिक!मैं हूँ एक गुलाम,
अपने आदरणीय मालिकों का,
पा के इशारा!बना जिम्मेदाराना,
उन्हीं लोगों के इशारों पर अब,
मैं सच्चाई पर शब्द कम्बल डाल,
सीख गया हर करतूत को छिपाना।
दिल एक दर्पण है!सच कहता है,
मैं सीख गया उसको भी  दबाना।
अपनी स्वयं की परछाई को भी,
अब सीख गया!गैरों का बताना।
सभी बहुत चतुर हैं इस जहां में,
इन्ही बहुत चतुर और चालाक!
सियासतदानों के खेल को देख,
सीखा धोखा देना-हाथ मिलाना।
मुझे नेता!जरूरी हुआ है बनाना,
क्योंकि अब मैं भी अच्छी तरह से,
सीख गया हूँ!वादे करके भुलाना,
और सीख गया खुद को ही ठगना।
मैं अब सीख गया ताल मिलना भी,
सभी अब सीख गये मुझे भी नचाना।
अपने सभ्य समाज में इस तरह!
व्याप्त वर्तमान कुव्यवस्था देखकर,
मजबूर होकर पड़ा मुझको ये लिखना

         #केशव कुमार मिश्रा

परिचय: युवा कवि केशव के रुप में केशव कुमार मिश्रा बिहार के सिंगिया गोठ(जिला मधुबनी)में रहते हैं। आपका दरभंगा में अस्थाई निवास है। आप पेशे से अधिवक्ता हैं।

Arpan Jain

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।