मन वन महकाता
जब डाली पर डोलूँ,
सूरज की आभा ने
हरे घूंघट उठाए,
खिला-खिला चेहरा
जग देख हर्षाया।
अली कली-कली पर,
उड़-उड़ गुंजराए।
रंग-बिरंगे तन मेरे,
कहीं गुलाबी कहीं लाल
नीले-पीले से रंगाया।
कभी छोटे कभी बड़े,
वृक्ष तरु तृण लता पर
खिलकर मुस्कुराया।
मेरी खुशबू जब बिखरी,
मेरा रूप जब निखरे
तितलिया हँसकर,
मधुपान करतीं।
यौवन की लालिमा,
मुझ पर चढ़ जाती।
मधुरिम नाम से मुझे बुलाते,
बेला, गुलाब,जूही,
चम्पा और चमेली।
सुकोमल तन-बदन,
तेज धूप मुझे सुखाए
तेज बारिश मुझे रुलाती,
हवा भी मुझे न भाती
मेरी अस्तित्व मिटा देती॥
#वाणी बरठाकुर ‘विभा’
परिचय:श्रीमती वाणी बरठाकुर का साहित्यिक उपनाम-विभा है। आपका जन्म-११ फरवरी और जन्म स्थान-तेजपुर(असम) है। वर्तमान में शहर तेजपुर(शोणितपुर,असम) में ही रहती हैं। असम राज्य की श्रीमती बरठाकुर की शिक्षा-स्नातकोत्तर अध्ययनरत (हिन्दी),प्रवीण (हिंदी) और रत्न (चित्रकला)है। आपका कार्यक्षेत्र-तेजपुर ही है। लेखन विधा-लेख, लघुकथा,बाल कहानी,साक्षात्कार, एकांकी आदि हैं। काव्य में अतुकांत- तुकांत,वर्ण पिरामिड, हाइकु, सायली और छंद में कुछ प्रयास करती हैं। प्रकाशन में आपके खाते में काव्य साझा संग्रह-वृन्दा ,आतुर शब्द,पूर्वोत्तर के काव्य यात्रा और कुञ्ज निनाद हैं। आपकी रचनाएँ कई पत्र-पत्रिका में सक्रियता से आती रहती हैं। एक पुस्तक-मनर जयेइ जय’ भी आ चुकी है। आपको सम्मान-सारस्वत सम्मान(कलकत्ता),सृजन सम्मान ( तेजपुर), महाराज डाॅ.कृष्ण जैन स्मृति सम्मान (शिलांग)सहित सरस्वती सम्मान (दिल्ली )आदि हासिल है। आपके लेखन का उद्देश्य-एक भाषा के लोग दूसरे भाषा तथा संस्कृति को जानें,पहचान बढ़े और इसी से भारतवर्ष के लोगों के बीच एकता बनाए रखना है।
Mon Feb 5 , 2018
ऐ खुदा हर दर्द को तू क्यों,दिल का पता देता मेरा, भूल क्यों जाता तू अक्सर में भी इक इंसान हूँ। शक सदा सोने पे जाता,कोयला कोई देखे नहीं, आग में क्यों झोंका मुझको,मैं तेरी पहचान हूँ। सह लिए जुल्मो-सितम,देने थे जितने दे दिए, आ जाओ तुम मेरे मुक़ाबिल,मैं खड़ी […]