सोते रहे हमेशा है कमान जिनके हाथों
हालात सरहदों के न हमें सोने देते,
बांधा है बेड़ियों ने मजबूर हम पड़े हैं
मिलती जो इजाजत साथी न खोने देते।
आखिर क्यों खड़े हम यूं ही बंदिशों में
मारने को उनको हो अधिकार में हमारे,
उठते रहे जनाजे वीरों के टोलियों से
बेखौफ वो पड़े हैं दरबार में हमारे॥
कब तक यूं चलेगा लाशों का आना-जाना
करते रहेंगें निंदा आवारगी बता के,
मुल्क मांगता क्या देखो तो गौर करके
लिपटा हुआ तिरंगा जाता नाराजगी जता के।
बदलो रिवाज सारे वो दिन बदल गए अब
कुछ लोग मेरे अपने परिवार में हमारे,
उठते रहे जनाजे वीरों के टोलियों से
बेखौफ वो पड़े हैं दरबार में हमारे॥
करते रहे सियासत वीरों की अर्थियों पर
लाचार मां के आंसू आकर न कोई पोंछे,
भूल के हैं बैठे गुजरी तमाम बातें
बापू का बुढ़ापा कैसे कटे न सोचें।
रोएगा हिन्द सारा हर आंख नम है होती
निकले न उनके आंसू जो सरकार में हमारे,
उठते रहे जनाजे वीरों के टोलियों से
बेखौफ वो पड़े हैं दरबार में हमारे॥
मुस्तैद जब सिपाही सीमा के प्रहरी बनकर
खामोश क्यों हुकूमत आवाज क्यों थमी है,
नासूर बन रहे हैं दिए दुश्मन के जख्म सारे
‘जतिन’ लिख रहा उसकी आंखों में नमी है,
बुझदिली के किस्से कबसे छप रहे हैं
कब वीरता छपेगी अखबार में हमारे।
उठते रहे जनाजे वीरों के टोलियों से
बेखौफ वो पड़े हैं दरबार में हमारे॥
#जतिन शुक्ल ‘फ़ैज़ाबादी’
परिचय : जतिन शुक्ल का साहित्यिक उपनाम-कवि जतिन फैजाबादी है। आपकी जन्मतिथि-२६ जनवरी १९९८
एवं जन्म स्थान-फैजाबाद है। में वर्तमान मिल्कीपुर(फैजाबाद-उत्तर प्रदेश) में रहते हैं। इनकी शिक्षा-बीए(जारी)है। आपको वन्दे मातरम सम्मान प्राप्त हुआ है। आपके लेखन का उद्देश्य-सामाजिक स्तर पर जागृति फैलाना है।