एक समय था गुरूजी जग में,
आदर ही पाते थे।
चरणों में जिनके दुनिया थी,
वो पूजे जाते थे।
भय था बच्चों को गुरूजी से,
जाने कौन सजा दे।
अब किनकी हिम्मत है इतनी,
थप्पड़ एक लगा दे।
भरी सभा में अब गुरूजी को,
ऐसे तौल रहे हैं।
ला दूँगा फिर से सड़कों पर,
नेता बोल रहे हैं।
कई महीनों से मिले न वेतन,
शोषण करती सत्ता।
बिन पुस्तक के कैसे बच्चे,
पाएंगे गुणवत्ता।
कैसे पढ़ाएं वे बच्चों को,
जीवन लील रहे हैं।
विद्यालय में बैठ गुरूजी,
अंडे छील रहे हैं।
जिनको है नजदीक शहर से,
वो तो चाँदी काटे।
दूर देहात में जो हैं जाते,
जनता भी अब डांटे।
कार्य अनेक सिर पर उनके,
नित्य नया फरमान।
देव से ऊँचा कैसे गुरूजी,
नित्य सहे अपमान॥
#बिनोद कुमार ‘हंसौड़ा’
परिचय : बिनोद कुमार ‘हंसौड़ा’ का जन्म १९६९ का है। आप दरभंगा (बिहार)में प्रधान शिक्षक हैं। शैक्षिक योग्यता दोहरा एमए(इतिहास एवं शिक्षा)सहित बीटी,बीएड और प्रभाकर (संगीत)है। आपके नाम-बंटवारा (नाटक),तिरंगा झुकने नहीं देंगे, व्यवहार चालीसा और मेरी सांसें तेरा जीवन आदि पुस्तकें हैं। आपको राष्ट्रभाषा गौरव(मानद उपाधि, इलाहाबाद)सहित महाकवि विद्यापति साहित्य शिखर सम्मान (मानद उपाधि) और बेहतरीन शिक्षक हेतु स्वर्ण पदक सम्मान भी मिला है। साथ ही अनेक मंचो से भी सम्मानित हो चुके हैं