वैवाहिक जीवन में बिखराव से बचें

pinki paturi
विवाह इस मानव जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है और एक सामाजिक दायित्व भी है। यह प्रेम अनुबंध दो मनुष्यों यानि पुरुष एवं स्त्री के परस्पर सहयोग और सहभागिता से आजीवन निभाया जाता है। सफल एवं सुखी वैवाहिक जीवन के कुछ नियम और शर्तें होती हैं,जिनका पालन दोनों के लिए अनिवार्य है।
 प्रेम का यह अनूठा संगम,समर्पण और विश्वास की नींव पर ही टिका रहता है।
 माना कि इतना आसान नहीं होता कि एक परिवेश में पालन-पोषण होने के बाद एकदम नए,अनजाने परिवेश में स्वयं को समाहित करना,किंतु यदि मानसिक क्षमताएं विकसित हैं तो बहुत कठिन भी नहीं है।
 ऐसा भी नहीं है कि,पहले जब संयुक्त परिवार में सब रहते थे तो वैचारिक मतभेद और वैमनस्यता नहीं थी,लेकिन वो सारे मतभेद परिवार में ही सुलझा लिए जाते थे। हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से समझता था। परिवार की मान-मर्यादा सर्वोपरि मानी जाती थी।
 त्याग,तपस्या,सहयोग,तृप्ति,परंपराओं का पालन,जहां है,वह घर स्वर्ग है। आज विवाह शारीरिक और भावनात्मक आवश्यकता नहीं रही है,इसका सामाजिक रूप भी विकृत हो गया है। ‘लिव इन रिलेशनशिप’ ने इस संबंध पर  और प्रहार किया है। आज के युवा जिम्मेदारी और बंधनों से मुक्त रहना चाहते हैं। शिक्षा प्राप्त करके घर से दूर भौतिकता में लिप्त हो गए हैं। परिवार में रहना उन्हें घुट-घुट के रहना लगता है। सेवा,समर्पण और सहानुभूति उनके हृदय में नहीं रह गई है।
माता-पिता के साथ छोटी जगह पर जीवन बिताने वाले को,मित्र ही पिछड़ा  या जिंदगी की दौड़ में हारा हुआ मानते हैं।
 अब समस्या यह है कि, वैवाहिक जीवन अल्प समय में ही टूटने लगे हैं। बिखराव का दंश झेलते तो दोनों ही हैं,लेकिन बुरा प्रभाव सिर्फ बच्चों पर पड़ता है। एकाकी अभिभावक बच्चों को पूरे संस्कार नहीं दे पाते हैं।
 बिखराव के दौरान दोनों ही सहानुभूति खोजते हैं और जहां भी वह मिलती है, वहीं झुकाव बढ़ जाता है। कई बार तो उनके साथ जान-बूझकर खेल खेला जाता है और कमजोर पक्ष का इस्तेमाल कोई तीसरा ही कर लेता है।
 खैर,कभी भी जब विवाह की जिम्मेदारी आती है,तो सबसे पहले पारिवारिक पृष्ठभूमि का कठोर जायजा ले लेना चाहिए। लड़की या लड़के,दोनों को ही पसंद करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
 बचपन से ही बच्चों क़ो प्रेम,समर्पण, त्याग तथा सहयोग की भावना सिखाना चाहिए। बिखराव की सोच को बदलने की कोशिश करनी चाहिए। दोनों पक्षों को वार्तालाप करके ही समझाना चाहिए। इसका कारण यदि दहेज है,तो बिल्कुल भी भरोसा नहीं करना चाहिए। वो व्यक्ति कभी भी संतुष्ट नहीं होगा। ऐसे बर्ताव से तो अलगाव ही बेहतर है।
वैवाहिक जीवन में यदि अवैध संबंध कारण बन रहे हैं और बातचीत से भी नहीं सुलझे,तो अलगाव ही बेहतर है।मारा-पीटी भी सहनीय नहीं है। बड़ों की बात मानकर,मनमुटाव खत्म हों तो ठीक है,वरना आत्मसम्मान और आत्मविश्वास के साथ आत्मनिर्भर हो जाएं। यह सारी बातें लड़की के लिए ही कही हैं,पर
इसके विपरीत आज लड़के भी दबाव का शिकार हो रहे हैं। मेरा पक्ष निश्चित रूप से अलग होने के लिए नहीं है,बल्कि मेरा मानना है कि दिल जुड़े रहें,मन मिले रहें। जीवनसाथी के साथ अंतिम सांस तक निभाया जाए और मन,कर्म और वचन से आजीवन प्रेम से रहें।
                                               #पिंकी परुथी  ‘अनामिका’ 
परिचय: पिंकी परुथी ‘अनामिका’ राजस्थान राज्य के शहर बारां में रहती हैं। आपने उज्जैन से इलेक्ट्रिकल में बी.ई.की शिक्षा ली है। ४७ वर्षीय श्रीमति परुथी का जन्म स्थान उज्जैन ही है। गृहिणी हैं और गीत,गज़ल,भक्ति गीत सहित कविता,छंद,बाल कविता आदि लिखती हैं। आपकी रचनाएँ बारां और भोपाल  में अक्सर प्रकाशित होती रहती हैं। पिंकी परुथी ने १९९२ में विवाह के बाद दिल्ली में कुछ समय व्याख्याता के रुप में नौकरी भी की है। बचपन से ही कलात्मक रुचियां होने से कला,संगीत, नृत्य,नाटक तथा निबंध लेखन आदि स्पर्धाओं में भाग लेकर पुरस्कृत होती रही हैं। दोनों बच्चों के पढ़ाई के लिए बाहर जाने के बाद सालभर पहले एक मित्र के कहने पर लिखना शुरु किया था,जो जारी है। लगभग 100 से ज्यादा कविताएं लिखी हैं। आपकी रचनाओं में आध्यात्म,ईश्वर भक्ति,नारी शक्ति साहस,धनात्मक-दृष्टिकोण शामिल हैं। कभी-कभी आसपास के वातावरण, किसी की परेशानी,प्रकृति और त्योहारों को भी लेखनी से छूती हैं।

matruadmin

Next Post

मिलते हैं आजकल

Sat Dec 2 , 2017
चंद सिक्कों की चमक खनक के आगे, ईमान डावांडोल करते हैं लोग आजकल। वो एक गरीब है जो लाखों का तनबदन, ईमान खातिर लगाता है मजूरी में आजकल। बेशक वो धनवान नहीं है नजर में जमाने की, पर वो ही एक अच्छा बचा है उसकी नजर में आजकल। सफेदी भले […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।