वतन को देखकर इबादत करते,
अम्बर भी ज़मीं पे उतार चुकी हूं मां।
आज कहते हैं मुझे दोषी खुशियों का,
बुरा वक़्त भी हंस के गुजार चुकी हूं मां॥
शीशे ने बयां कर दी हकीकत ज़माने की,
तेजाब में खुद को निहार चुकी हूं मां।
जकड़े हुए से जिस्म में बेबस होकर,
जबरन अपने-आपको उतार चुकी हूं मां॥
गुजरते हुए रास्तों में महसूस करती थी,
अकेली नज़रों के वार से तार चुकी हूं मां।
इतना सब रूह में समाकर दरिया,
सारी बर्दाश्त की सीमा पार चुकी हूं मां॥
उलझी हुई पहेली को सुलझा नहीं पाया,
दरवाजों पे सर पटक सौ बार चुकी हूं मां।
नहीं देखी किसी की पीर तो चीखती रही,
गंदे हाथ की मिट्टी को उबार चुकी हूं मां॥
नोटों की पेटियों में भरकर के जालिम,
शहर में बिककर जा बाजार चुकी हूं मां।
आह जब निकलती थी दिल को चीर देती थी,
आंसू खून के रोते बहा हर बार चुकी हूं मां॥
किसी के साथ न हो ये कभी तुम सजा देना,
उन गुनाहों को जुबां से इजहार चुकी हूं मां।
अंधेरे बादलों को मैं जुगनू-सी चमक देकर,
टूटते तारों में खुद को संवार चुकी हूं मां॥
जाना है मुझे छोड़कर तेरी बनी दुनिया,
दिलो-जान भी तुझ पर वार चुकी हूं मां।
चन्द अपने यहां अपनों से दगा कर बैठे,
नकाब चेहरों के भी उघाड़ चुकी हूं मां॥
बद्दुआ देती थी मुझको मतलबी आंखें,
खुद के हाथ ही खुद को मार चुकी हूं मां।
सहन करके जहन में नफरतें कितनी,
सारी दुनिया से अब हार चुकी हूं मां…॥
#रानू धनौरिया
परिचय : रानू धनौरिया की पहचान युवा कवियित्री की बन रही है। १९९७ में जन्मीं रानू का जन्मस्थान-नरसिंहपुर (राज्य-मध्यप्रदेश)है। इसी शहर-नरसिंहपुर में रहने वाली रानू ने जी.एन.एम. और बी.ए. की शिक्षा प्राप्त की है। आपका कार्यक्षेत्र-नरसिंहपुर है तो सामाजिक क्षेत्र में राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़ी हुई है। आपका लेखन वीर और ओज रस में हिन्दी में ही जारी है। आपकॊ नवोदित कवियित्री का सम्मान मिला है। लेखन का उद्देश्य- साहित्य में रुचि है।