अन्जानों के साए में अपनों को खोजता है,
बड़ा बावरा है वो जो इस कदर सोचता है।
कौन कहता है गिरते नहीं जाँबाज जंग-ए-मैदान में,
उसे क्या पता जो मैदान छोड़ स्थान ढूँढता है।
लड़खड़ाया-सा क्यों है दौरे-ए-जूनून में,
मन्जिल बाकी है अभी वो, नई राह ढूँढता है।
रिश्तों की कलाबाजी है मतलब के दौर में,
जिस्म के बाजार में इंसानियत ढूंढता है।
वो कालिख जो पुती दाग़ के निशां बाकी है,
वहम के घेरे से सफ़ा दूधी पोशाक ढूँढता है।
रूह को मारकर लाश लिए फिरता है,
अहम को जिन्दा रखकर दोस्त ढूँढता है।
गफ़लत से बाहर आ ‘नादान’, किरण बाकी है,
किरण से मुँह फेरकर उजाला कहाँ ढूँढता है।
अन्जानों के साये में अपनों को खोजता है,
बड़ा बावरा है वो जो इस कदर सोचता है॥
#पुष्पेन्द्र सिंह मलिक ‘नादान’
परिचय: पुष्पेन्द्र सिंह मलिक ‘नादान’ की जन्मतिथि -१२ अक्टूबर १९७६ है। आप उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ में बसे हुए हैं,जबकि जन्म स्थान-दिल्ली है। शिक्षा में परास्नातक (इतिहास) सहित आईटीआई(इलैक्ट्रिशियन) तथा रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन से जनरल फायर फाईटिंग कोर्स कर चुके हैं,इसलिए कार्यक्षेत्र सेना की अग्निशमन शाखा(फायरमैन) है। आप किसी विशेष विधा की अपेक्षा मन में जो भाव आया,उसे ही लिखते हैं। लेखन का उद्देश्य आत्म सन्तुष्टि ही है। आप ब्लॉग पर भी लिखते रहते हैं।