जनहित में डोनेशन

javahar

`आप खुद देखिए सर जी,स्कूल की फीस,बस फीस,लंच फीस,किताबें,ड्रेस,जूते,ट्यूशन फीस,और भी न जाने क्या क्या तो लगता है बच्चों को पढ़ने में!! उस पर पता नहीं,किस मीठे में आपने प्रायवेट स्कूलों को डोनेशन(मन का अनुदान) लेने की छूट दे दी !!`

वे कुछ देर चिंतन-योग के बाद बोले-`राष्ट्रहित के लिए सरकार को कुछ कठोर निर्णय लेना पड़ते हैं।एक अच्छे नागरिक के तौर पर आपको सहयोग और समर्थन करना चाहिए,  वरना….`

`अपनी जेब कटवाने में कौन सहयोग करता है सर !! आपके बच्चे भी तो होंगे,वे भी तो पढ़ते होंगे।`  फरियादी ने `वरना` पर ध्यान दिए बगैर अपनी बात जारी रखी।

`तुम प्रदेश से बाहर रहते हो क्या !? जनरल नालेज तक नहीं है तुम्हें ! ये भी नहीं जानते कि सरकार मामा है और उसके भांजा-भांजी होते हैं।`

`एक तो यह पता नहीं चलता कि,कब आप मामा हो लेते हो और कब सरकार बन जाते हो !! और मामा हो तो पढ़ाने नहीं दोगे क्या भांजा-भांजी को !? जानते हो स्कूल वाले पूरे एक लाख डोनेशन मांग रहे हैं !!`

`देखो हम बच्चों के मामा जरुर हैं लेकिन,आप जीजा बनने की कोशिश तो करो मत।

प्रदेश का कोई भी स्कूल एक लाख नहीं मांग रहा है।आप झूठ नहीं बोलिए, वरना…….` लगा सरकार बकायदा नाराज होने जा रही है।

`सर, निन्यानवे हजार नौ सौ निन्यानवे रूपए का क्या मतलब होता है !!`

`देखिए वे लोग तो एक लाख से कम पर मान ही नहीं रहे थे,लेकिन सरकार ने दबाव बनाया।जनहित में जितना कर सकती थी सरकार ने किया।`

`क्या आप चाहते हैं कि किसानों की तरह पेरेंट्स भी आत्महत्या करने लगें !? लोग कैसे दे पाएंगे डोनेशन में इतनी बड़ी रकम !! आप मामा हो या कंस मामा हो !?`

`अरे शांत हो जाओ जीजा,आप तो नाराज होने लगे !! सरकार को पता है कि नहीं दे पाएंगे, इसलिए सरकारी स्कूलों के दरवाजे खुले हैं। फीस कम है,डोनेशन तो है ही नहीं। वहाँ सबका स्वागत है। यू नो,मामा सिर्फ ब्याव करवाने के लिए नहीं है।`

`सिर्फ सरकारी स्कूलों में प्रवेश के लिए आपने उन्हें लूट की छूट दे दी !!`

`ऐसा नहीं है,सब जानते हैं कि जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। देश में पचास हजार बच्चे रोज पैदा हो रहे हैं। कितने ?! …पच्चास हज्जार !! पता है ना कितनी मिंडी लगती है पचास हजार में !! फेमिली प्लानिंग योजना भी इस डोनेशन योजना में शामिल है। जबरन नसबंदी-सेवा तो जनता को पसंद आती नहीं है। लोग जब एक बच्चे को पढ़ाने में पस्त हो जाएंगे तो दूसरे बच्चे का विचार सपने में भी नहीं आएगा। इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ? सरकार जो करती है जनहित में ही करती है। प्रायवेट स्कूल देश सेवा के लिए आगे आए हैं और जनहित में डोनेशन स्वीकार रहें हैं तो,उनका अभिनन्दन किया जाना चाहिए।`

`हम जानते हैं बच्चों के मामा कि,जल्दी ही चुनाव आने वाले हैं !?`

हाँ, ये भी एक कारण है,बल्कि मज़बूरी कहिए इसको। आप लोग जानते ही हैं कि, असल जिंदगी में मंहगाई बहुत बढ़ गई है। बिना खर्चा किए जनता वोट भी नहीं देती है। आप लोगों को ही पिलाएंगे-खिलाएंगे। राम की चिड़िया राम का खेत,हमारा कुछ नहीं,सब आप लोगों के लिए ही है।आपको जब भी देना पड़ेगा,वह लौटकर आपके पास ही आएगा,इसलिए मानो कि जो भी हो रहा है जनहित में है।

                                                                  #जवाहर चौधरी

परिचय : जवाहर चौधरी व्यंग्य लेखन के लिए लम्बे समय से लोकप्रिय नाम हैl 1952 में जन्मे श्री चौधरी ने एमए और पीएचडी(समाजशास्त्र)तक शिक्षा हासिल की हैl मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इन्दौर के कौशल्यापुरी (चितावद रोड) में रहने वाले श्री चौधरी मुख्य रूप से व्यंग्य लेखन,कहानियां व कार्टूनकारी भी करते हैं। आपकी रचनाओं का सतत प्रकाशन प्रायः सभी हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में होता रहता हैl साथ ही रेडियो तथा दूरदर्शन पर भी पाठ करते हैं। आपकी करीब 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं,जिसमें 8 व्यंग्य संग्रह,1कहानी संग्रह,1लघुकथा संग्रह,1नाटक और 2उपन्यास सम्मिलित हैं। आपने लेखन को इतना अपनाया है तो,इसके लिए आप सम्मानित भी हुए हैंl प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान में म.प्र.साहित्य परिषद् का पहला शरद जोशी पुरस्कार आपको कृति `सूखे का मंगलगान` के लिए 1993 में मिला थाl इसके अलावा कादम्बिनी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय प्रतियोगिता में व्यंग्य रचना `उच्च शिक्षा का अंडरवर्ल्ड` को द्वितीय पुरस्कार 1992 में तो,माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान से भी 2011 में भोपाल में सराहे गए हैंl 1.11लाख की राशि से गोपालप्रसाद व्यास `व्यंग्यश्री सम्मान` भी 2014 में हिन्दी भवन(दिल्ली) में आपने पाया हैl आप `ब्लॉग` पर भी लगातार गुदगुदाते रहते हैंl

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