विकसित भारत में आरक्षण का औचित्य

namita dube

आरक्षण को स्वतंत्र भारत के संविधान में एक समाधान के रूप में शामिल किया गया था,परन्तु आज उसी आरक्षण ने समस्या बनकर पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हुआ,तब भारतीय समाज जातीय व्यवस्था पर आश्रित थाI दलितों के साथ उचित न्याय हो सके,उन्हें भी समाज में उन्नति के समान अवसर प्राप्त हों,इसलिए आरक्षण व्यवस्था को लागू किया गयाI संविधान निर्माता डॉ. आम्बेडकर साहब इस बात के सख्त खिलाफ थे कि,समाज का कोई भी अल्पसंख्यक तबका हमेशा के लिए अल्पसंख्यक बना रहे। उनका विचार था कि,अपना विकास करने के बाद उस विशेष समुदाय को बाकी समुदाय में घुल-मिल जाना चाहिए और अपना विशेष दर्जा छोड़ देना चाहिएI अतः आरक्षण के लिए १०वर्ष की अवधि तय की गई तथा प्रावधान रखा कि,जरुरत समझे जाने पर इस अवधि को बढ़ाया जा सकता है।

आज यही आरक्षण सम्पूर्ण समाज के गले की हड्डी बन गया है। आरक्षण की आग आज पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैलती जा रही है। गुजरात में पटेल,आंध्रप्रदेश में कापस,महाराष्ट्र में मराठा,असम में अहोम,हरियाणा में जाट,राजस्थान में गुर्जर और यहाँ तक कि,ब्राह्मणों द्वारा भी गुजरात में इस आग में कूदने के समाचार आ चुके हैं। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशानुसार आरक्षण ५० फीसदी से अधिक नहीं किया जा सकता है,ऐसी अवस्था में जो आरक्षण की  मांग स्वीकार होगी,वह इसके अंतर्गत ही आंकी जाएगी,और इस प्रकार जो जातियां आज ५० प्रतिशत आरक्षण के अंतर्गत लाभान्वित हो रही हैं,उन्हें कटौती झेलनी पड़ेगी। यही कारण है कि,जहां कहीं आरक्षण की मांग उग्र होती है,समाज में दूसरे वर्गों के कान खड़े हो जाते हैं,और वे विरोध में आ जाते हैं। अतः जहां एक ओर आरक्षण समाज में वैमनस्यता फैला रहा है,वहीँ सक्षम को पंगु बना रहा हैI आरक्षण का उचित लाभ समाज के उस वर्ग तक नहीं पहुंच पाता  है,जो वास्तव में दीन हैl हमारे संविधान निर्माता इस सोच के साथ आरक्षण का सूत्र लेकर आए  थे कि,इससे देश का वंचित और पिछड़ा समुदाय दूसरे वर्गों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चल सकेगा लेकिन,आज संविधान लागू होने के ६७ वर्ष बाद हालत यह हो गई है कि,हमारे देश में हर किसी को आरक्षण चाहिएl हाईकोर्ट ने प्रदेश में आरक्षित वर्ग के पदोन्नति से जुड़े सिविल सर्विसेज प्रमोशन रूल्स २००२ को असंवैधानिक करार कर दिया हैIइसके उचित-अनुचित का निर्णय करना हमारा कार्य नहीं है,किन्तु इसके तहत ३० अप्रैल २०१६ के बाद जिन १५ हजार कर्मचारियों को पदोन्नति मिलना थी,उसे सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दे रखे हैंl  लिहाजा आरक्षित वर्ग और अनारक्षित वर्ग दोनों ही परेशान हैंI

वास्तव में आरक्षण मतों की राजनीति का खिलौना बनकर रह गई है,सरकार चाहकर भी आरक्षण नीति में बदलाव नहीं कर पा रही हैI हमें यह विचार करना होगा कि,मौजूदा परिस्थितियों के चलते आरक्षण को आगे जारी रखने के क्या आर्थिक परिणाम हो सकते हैं? समय की मांग को देखते हुए आरक्षण को जातीय आधार नहीं,वरन वार्षिक आय को आधार बनाया जाना चाहिएI अतः गरीब वर्ग जिन्हें,निश्चित तय की गई वार्षिक आय के आधार पर सभी सुविधाएं मुफ्त या रियायती दरों पर मुहैया करवाई जाएI उन्हें रहने के लिए रियायती कीमत पर घर,अनाज,शिक्षा,स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएI उन्हें विकास के सभी उचित अवसर प्रदान करवाए जाएं,किन्तु नौकरी और पदोन्नति में आरक्षण पूर्णतः ख़त्म करना चाहिए, तभी हमारा देश सही मायने में लोकतंत्रात्मक देश होगाI

यह विडम्बना है कि,सार्वजानिक तौर पर कोई भीआरक्षण के बारे में खुलकर बात नहीं करते,इसे सत्ता की लोलुपता कहें या सत्ता खोने का डरI कुल मिलाकर यह एक राजनीतिक हथकंडा है,जिसे सबी दल चुनाव के समय अपनाते हैं I चूँकि,यह मुद्दा जनाधार और वोट बैंक से जुड़ा है,इसलिए हर राजनीतिक दल इस मुद्दे पर हमेशा ही सावधानी बरतता रहा है ,जो देश और समाज में अस्थिरता और अव्यवस्था को बढ़ावा देगीI हमारी देश के खैरख्वाहों से अपील है कि,वह अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर देश हित में सोचें और देश के युवा वर्ग को नौकरी में आरक्षण की बैसाखी से मुक्त करवाएंI

                                                                          #नमिता दुबे

परिचय : नमिता दुबे  इंदौर की निवासी हैंl आप शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं और रचनाएं-लेख लिखने का काफी पुराना शौक रखती हैंl अभी करीब एक वर्ष से अधिक सक्रिय हैं,क्योंकि पात्र-पत्रिकाओं में इनका सतत प्रकाशन हो रहा है I 

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