बेलगाम बढ़ती आबादी एक विश्वव्यापी समस्या है, खासतौर पर अविकसित और विकासशील देशों के लिए यह और भी अधिक गंभीर है। विशेषतः भारत में वृद्धि और विकास को हानि पहॅुंचाते हुए तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या परेशानी का सबक बन चुकी है। उधेड़बुन में हम १.३० अरब हो चुके हैं। इतर,हमारे पास संपूर्ण भू-भाग का केवल ३ अंश है,लेकिन हम जहान की कुल जनसंख्या के १७ फीसद हैं। विश्व में हम सर्वाधिक जनसंख्या के मामले में दूसरे क्रम में हैं,वहीं धरा धारिता में सातवॉं हैं। जनसंख्या दर अमूमन २ प्रतिशत प्रति वर्ष है,इस लिहाज से हर साल एक आस्ट्रेलिया पैदा कर रहे हैं। गति इसी प्रकार रही तो हम निश्चित तौर पर २०५० तक चीन को पछाड़ देगें,यह आंकड़े आह्लादित करते हैं। कमोबेश इतने जन इतनी वसुंधरा में कैसे विराजेंगे,क्योंकि जन-जन की भांति धरती तो नहीं बढ़ाई जा सकती,यह तो जितनी की उतनी ही रहेगी।
बावजूद जनसंख्या बढ़ाने में विविध आयामों की विशेष भूमिका है जिसमें रुढ़िवादिता,वंशावली और समय पूर्व विवाह जैसी बेतुकी परम्परा का खासा योगदान है। यह देखा गया है कि,देर से हुई शादी जैसे २० या अधिक उम्र वाली लड़की की तुलना में कम उम्र में हुई शादी वाली लड़की के अधिक बच्चे होते हैं। भारत में सभी समुदायों और धर्म में लड़के की प्राथमिकता भी जनसंख्या बढ़ोतरी का प्रमुख व पहला कारक नजर आता है। जागरूकता,अज्ञानता उच्च जन्म दर का दूसरा कारक है। जनसंख्या अनियोजन के मामले में निरक्षर महिलाओं के पास शिक्षित महिलाओं के मुकाबले अधिक बच्चे होते हैं। निर्धनता को बेपनाह आबादी के मुख्य कारण में गिना जा सकता है। निर्धन परिवारों में बच्चे परिवार की आय में योगदान करने के लिए अतिरिक्त हाथों के रूप में देखे जाते हैं,इसीलिए आमतौर पर गरीब लोग अधिक बच्चों की और अग्रसर होते हैं। वे सामान्यतः उनकी शिक्षा,स्वास्थ्य अथवा पालन-पोषण में अधिक निवेश नहीं करते,ऐसा करना बेमतलब समझते हैं। ये बच्चे आजीवन निरक्षर और अकुशल श्रमिक रहते हैं,और अपनी जीवन की परिस्थितियों को सुधारने में सदा अक्षम रहते हैं।
कदमताल,आबादी की चपेट में समाज के सभी वर्ग प्रकृति का विदोहन और आर्थिक लाभों की पहुॅंच से दूर होते जा रहे हैं। साथ ही पर्यावरण,आर्थिक,शैक्षणिक,औद्योगिक और सामाजिक विकास की गाथा में अनेक बाधाएं सामने आ रही हैं। इससे संसाधनों की बढ़ी हुई मॉंगों,सुविधाओं और सेवाओं के रूप में रोटी,कपड़ा,मकान,स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार आदि आधारभूत आवश्यकताओं को सुनिश्चित करने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है। फलस्वरूप धरती के दोहन से एक दूषित समाज और प्रदूषित वातावरण का निर्माण हो रहा है। भलाई के वास्ते महिला-पुरूष दोनों को समान रूप से दवाई, पढ़ाई और कमाई के साधन उपलब्ध करवाने ही होंगे।
अलबत्ता,अनाप-शनाप जनसंख्या विस्फोट ने प्राकृतिक,सामाजिक-आर्थिक विकास की चाल को बुरी तरह से प्रभावित किया है। अतः जनसंख्या नियंत्रण और स्थिरीकरण के लिए जनसंख्या संबंधी समस्याओं को सभी स्तरों में निराकृत करने की जरूरत है। तभी ३ फीसद जमीन के मुकाबले १७ फीसद जन के औसत को कम किया जा सकता है। यही हम सबका नैतिक दायित्व ही नहीं,कर्तव्य है कि इसे अमलीजामा पहनाने में कोई कोर-कसर न छोड़ें। पहल से जन और जमीन का संतुलन बना रहेगा,नहीं तो अनावश्यक बोझिल दबाव से आने वाले समय में चुटकीभर धरा में मुट्ठीभर लोगों का रहना नामुमकिन हो जाएगा। यह जनसंख्या विस्फोट की खुल्ली-खुल्ली संभावी आहट है, यथेष्ट छोटा परिवार,सुखी परिवार और विकसित देश की मीमांसा को अपनाना ही एकमेव विकल्प है।
#हेमेन्द्र क्षीरसागर