आज जीने के लिए,
इक शिखण्डी चाहिए॥
औंधे मुंह है रुढ़ियां
धूल भरी है आँख,
चिकना खीरा रो रहा
भीतर देखे फाँक।
इक नए संधान को,
बस रणचंडी चाहिए॥
बन्दूकी आग डर रही
उछले कंकड़-पत्थर,
भूख करे गंधर्व गान
भरे नोट मुह शंकर॥
आत्मरक्षा कर लिए,
एक बन्दी चाहिए॥
फटा हुआ ईमान है
तार-तार है नीति,
खाली डुबकी लगा रहे
उजली बताए रीति॥
सर्व सिद्ध साधने को
इक घमंडी चाहिए॥
फैल रहा है हर तरफ
वैमनस्य का रोग,
नाच रही है विषमता
रोवे मन का योग॥
प्रलोभन फाँकने को,
शिव से दण्डी चाहिए॥
#सुशीला जोशी
परिचय: नगरीय पब्लिक स्कूल में प्रशासनिक नौकरी करने वाली सुशीला जोशी का जन्म १९४१ में हुआ है। हिन्दी-अंग्रेजी में एमए के साथ ही आपने बीएड भी किया है। आप संगीत प्रभाकर (गायन, तबला, सहित सितार व कथक( प्रयाग संगीत समिति-इलाहाबाद) में भी निपुण हैं। लेखन में आप सभी विधाओं में बचपन से आज तक सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों का प्रकाशन सहित अप्रकाशित साहित्य में १५ पांडुलिपियां तैयार हैं। अन्य पुरस्कारों के साथ आपको उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य संस्थान द्वारा ‘अज्ञेय’ पुरस्कार दिया गया है। आकाशवाणी (दिल्ली)से ध्वन्यात्मक नाटकों में ध्वनि प्रसारण और १९६९ तथा २०१० में नाटक में अभिनय,सितार व कथक की मंच प्रस्तुति दी है। अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षण और प्राचार्या भी रही हैं। आप मुज़फ्फरनगर में निवासी हैं|
Thu Jul 6 , 2017
तेरी नजर-सा एक मैकदां चाहिए, जिंदगी में तुझसा ही नशा चाहिए॥ कत्ल हो जाते तेरी एक नजर से, जिंदगी भर साथ मय-सा चाहिए॥ नहीं किसी मंजिल की तलाश मुझे, हर कदम हमसफर तुझसा चाहिए॥ हसरतें हो जाएंगी पूरी सारी अब, ‘मनी’ को सनम आसरा चाहिए॥ रहनुमा बन गए अब तुम […]