ओ मानव
तुम्हें क्या चाहिए….,
शायद तुम
खुशी ढूंढ़ते हो…
दूसरो को रुलाकर,सताकर,
दुख पहुंचाकर,अपने शब्दों से निरावृत कर-
माँ-बहनों को सड़कों पर लाकर,
तुम खुशी ढूंढ़ते हो….।
पर,
नहीं….नहीं….,
कर लो यकीं..
खुशी यहाँ है नहीं।
किसी दर्दे दिल की दवा
बनकर तो देखो……।
असहायों की दुआ
बनकर तो देखो…।
बच्चों के होंठों की मुस्कान,
माँ-बहनों के विश्वास और खुशियों पर
परवान चढ़कर तो देखो
कितनी खुशी मिलती है….!
जब तुम शुभ कर्मों से-
अपना सुखद-
भविष्य लिखते हो..।
माँ की आँखों में ममता,
पिता के चेहरे पर
आश्वासन बन खिलते हो…,
कितनी खुशी मिलती है।
तुम मानव हो-
जिस रूप में जन्म लेने हेतु
ईश्वर भी स्वर्ग छोड़-
धरा पर आते हैं।
राम,कृष्ण,बुद्ध,गाँधी और
न जाने कितने ही रूपों में-
मनसा,वाचा,कर्मणा,
पृथ्वी को कृत-कृत्य कर जाते हैं।
एक-एक शब्द उनके,
जो ऋचाएँ बन जाती हैं।
और उनके कर्तव्य जो
साधारण होते हुए भी,
असाधारण और वरेण्य ,
बन जाते हैं।
मानव,
मन से बना है-
जो अपने मन पर शासन करे-
नियंत्रित रखे-
मानवोपेक्षित कर्म करे-
वह मानव है।
जो मन के अधीन हो
अनपेक्षित रूपों में-
मन,कर्म वचन से-
मानवता को रक्तरंजित करे
क्या वह मानव है?
नहीं कदापि नहीं……।
तुम अपने ही-
कर्म,वचन और सोचों से
अपने,
और फिर अपने परिवेश एवं संस्कार का
परिचय देते हो….।
असंख्य अभिशाप और
बद्दुआएँ लेते हो….।
वह शब्द,वह हरकतें,जो सदा
मानवता के लिए-
गाली है।
उन बातों को तो तूने ,
अब तक,
बड़े जतन से संभाली है।
ओ नई पौध,
नई सोच-नई उमंग,
पहचानो…..
खुशी,प्रेम,मानवता और सत्य का
सही रूप….।
तुम ऐसा कर सकते हो…।
खुद को बदल सकते हो…।
अपनें अंदर में छिपे-
मानव को जगाकर तुम,
महामानव बन सकते हो॥
#डॉ.अन्नपूर्णा श्रीवास्तव
परिचय : डॉ.अन्नपूर्णा श्रीवास्तव लेखन में कविता,कहानी,ग़ज़ल माता के आगमन-विसर्जन के गीत भजन निबंध आदि लिखती हैं। आप लगभग सभी विधाओं में सृजन करती हैं। आप बिहार से हैं।