
वो 31 जनवरी की रात
याद है न!
तेरी मेरी पहली मुलाकात..
मेरा तुझमें खोना,
तेरा चुपके से शर्माना
तुम्हारे लंबे बालों में गुम होने की तमन्ना,
याद है न।
वो तीन दिन बाद
मेरा तेरा घूमने जाना,
कोसी की लहरों के बीच से निकलकर
ठंडी हवाओं में
तेरा मुझे कसकर पकड़ना..
और कुछ न कहना
गाड़ी पर चलते-चलते,
मेरा इजहार करना
किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं,
वो कहानी
जिसमें मैं और तुम
मिले-बिछड़े
फिर मिले और
हमेशा के लिए बिछड़ गए।
याद है मेरा तुमसे मिलने के लिए आना,
घंटों तुम्हारा इंतजार करना..
और तुम्हारे देर से आने पर तुम्हें डांटना,
फिर बस की आखिरी सीट पर बैठना.
अपने हाथों में तुम्हारा हाथ थामना,
और कहते जाना
मुझसे कभी दूर न जाना,
आज ये सारी बातें
एक बुरे सपने-सी लगती हैं,
और ये यादें मुझे चिढ़ाकर कहती हैं कि,
तुम अब मेरे पास नहीं
और मैं तुम्हारे पास होने के
बावजूद भी,
तुम्हारे पास नहीं।
सुनो कभी याद आए मेरी,
तो लौट आना
आज भी तुम्हारा शोना
तुम्हारा ही है॥
#पीयूष चीलवाल
परिचय : पीयूष चीलवाल, उत्तराखंड के रामनगर शहर में रहते हैं। 19 वर्षीय पीयूष का एक काव्य संग्रह ‘अभी कुछ बाकी है’ प्रकाशित हो चुका है और एक उपन्यास प्रकाशनाधीन है। घूमने-फिरने के शौकीन पीयूष लेखन कार्य के अलावा छायाकारी भी करते हैं।फिलहाल यह जनसंचार एवं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं। आपको कविताएँ उकेरना अधिक पसंद है।
Sat Jun 24 , 2017
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