पुस्तक समीक्षा: ‘फिल्म खत्म होने के बाद’

श्याम यादव की किताब ‘फिल्म खत्म होने के बाद’ सामान्य फिल्मी किताबों से अलग अपनी विषयवस्तु और दृष्टिकोण के कारण ध्यान खींचती है। आमतौर पर फिल्मों पर लिखी जाने वाली किताबें उनके कथानक, कलाकारों, निर्देशन, संगीत और तकनीकी पक्षों की चर्चा करती हैं। इसके विपरीत, यह किताब इस सवाल पर केंद्रित है कि फिल्म देखने के बाद दर्शक अपने साथ क्या लेकर सिनेमाघर से बाहर निकलता है। फिल्म उसके भीतर कौन-से विचार जगाती है, जीवन को देखने की उसकी दृष्टि में क्या बदलाव लाती है और सामाजिक यथार्थ से उसका रिश्ता किस तरह बनता है किताब का मूल सरोकार इन्हीं सवालों से है।
चार खंडों में विभाजित इस पुस्तक की विशेषता यह है कि लेखक फिल्मों को केवल मनोरंजन का माध्यम मानकर उनकी व्याख्या नहीं करते, बल्कि उनके प्रभाव और अंतर्निहित अर्थों को समझने की कोशिश करते हैं। इस दृष्टि से किताब पाठक को फिल्मों के बारे में पहले से बनी धारणाओं से आगे जाकर सोचने का अवसर देती है। फिल्म का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने दर्शक का कितना मनोरंजन किया, बल्कि इस कसौटी पर भी होना चाहिए कि उसने दर्शक को कितना संवेदनशील और विचारशील बनाया।
किताब की भाषा और शैली भी इसे प्रचलित फिल्मी लेखन से अलग करती है। इसमें पद्यात्मक प्रवाह या भावुक अभिव्यक्ति के बजाय गद्यात्मक विवेचन अधिक दिखाई देता है। यह शैली विषय को गंभीरता देती है, लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। जो पाठक फिल्म संबंधी लेखन में रोचक किस्सों, सहज प्रवाह और भावनात्मक जुड़ाव की अपेक्षा करते हैं, उन्हें इसकी शैली कुछ हद तक नीरस लग सकती है। हालांकि, गंभीर पाठकों के लिए यही शैली विचारों पर ठहरकर सोचने का अवसर भी बन सकती है।
पुस्तक की सबसे बड़ी कमी इसका चित्रविहीन होना है। फिल्मों पर आधारित किताब में एक भी फोटो न होना खटकता है। फिल्में दृश्य माध्यम हैं और उनसे जुड़ी तस्वीरें पाठकीय अनुभव को समृद्ध करने के साथ चर्चा को अधिक जीवंत बना सकती थीं। कुल मिलाकर, ‘फिल्म खत्म होने के बाद’ फिल्मों को देखने के बजाय उनके प्रभाव को समझने की कोशिश करती है। विषय की दृष्टि से यह एक सार्थक पहल है, लेकिन अधिक सहज भाषा और उपयुक्त चित्रों के समावेश से किताब पाठकों के व्यापक वर्ग तक बेहतर ढंग से पहुंच सकती थी।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।